चित्रलेखा और टेढ़े-मेढे़ रास्ते जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता, देशभक्त और विख्यात कवि-साहित्यकार, पत्रकार पद्मभूषण बाबू भगवती चरण वर्मा के जन्मस्थान सफीपुर में उन जैसी शख्सियत की यादें सहेजकर नहीं रखी गईं।
उन्नाव को विकास के मामले में पिछड़ा भले कह लें, लेकिन इतिहास और चिह्न साक्षी हैं कि इस धरती ने देश को कड़े क्रांतिकारी, सक्षम-सबल साहित्यकार, प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञ, बेजोड़ कवि और कई महापुरुष दिए हैं। कोई छोटे गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमका तो किसी ने संविधान सभा में अपनी भूमिका निभाई तो किसी ने बेहद अभाव में रहकर स्वतंत्रता संग्राम का स्वभाव ही बदल डाला और देश की आजादी के लिए मरमिटा। अमर उजाला आपको इनके व्यक्तित्व, कृतित्व की जानकारी देकर बताएगा कि वे अमरत्व को कैसे प्राप्त हुए। पढ़िये सिलसिलेवार भारत माता के सच्चे सपूतों की सच्ची कहानियां उनके गांव-घर से।
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चित्रलेखा और टेढ़े-मेढे़ रास्ते जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता, देशभक्त और विख्यात कवि-साहित्यकार, पत्रकार पद्मभूषण बाबू भगवती चरण वर्मा के जन्मस्थान सफीपुर में उन जैसी शख्सियत की यादें सहेजकर नहीं रखी गईं। जिस घर में जन्म हुआ, वह बिक गया, वहां दुकानें सज गईं। उनके नाम पर बना पुस्तकालय कबाड़ में तब्दील हो गया और उनके नाम पर स्वीकृत सड़क पर आज तक एक पहचान पट भी नहीं लगा। हां, सात महीने पहले स्थानीय संस्था अर्चना परिषद की कोशिश से एक पार्क में उनकी प्रतिमा स्थापित जरूर की गई। पेश है शैलेश अवस्थी की रिपोर्ट...
उन्नाव। मुख्यालय से कोई 25 किलोमीटर दूर सफीपुर में 30 अगस्त 1903 में जन्मे देश के महान साहित्यकार भगवती चरण वर्मा की मुख्य पहचान उपन्यासकार के रूप में थी। उनका लालन-पालन यहीं हुआ। उनके कारण सफीपुर भी देश-दुनिया में पहचाना गया। हिंदी साहित्य में उनका अद्भुत योगदान है। यह अलग बात है कि सफीपुर ने उन्हें उतना महत्व नहीं दिया कि वहां नई पीढ़ी उनके बारे में जाने और प्रेरणा ले।
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शायद यही कारण है कि इस कस्बे से नौकरशाह और कारोबारी तो निकले, लेकिन ऐसे किसी साहित्यकार ने जन्म नहीं लिया, जो वर्मा जी के आसपास भी ठहरता हो। सफीपुर के मुख्य स्थानों और सड़कों पर कोई ऐसा कोई पट नहीं दिखा, जो भगवती चरण वर्मा की पहचान बताता या दर्शाता हो। न तो कहीं उनके कृतित्व की जानकारी और न ही कहीं कोई स्मारक। आम आदमी से पूछो तो जवाब, नहीं पता। मोहल्ला टिकुली के जिस घर में उनका जन्म हुआ, अब वहां दुकानें बन गई हैं। आसपास के ज्यादातर लोग और दुकानदार भी नहीं जानते कि वह जिस जगह बैठे हैं, यहां कभी विख्यात हस्ती जन्मी थी।
कस्बे के दिवाकर द्विवेदी (सेवानिवृत्त शिक्षक) से भेंट हुई तो वह एक पार्क में ले गए। वहां बीच में बाबू भगवती चरण की एक छोटी प्रतिमा स्थापित थी। एक कोने में उनके नाम पर पुस्तकालय एवं वाचनालय था, जो लगभग खंडहर में तब्दील हो चुका। पुस्तकों का पता नहीं। दिवाकर द्विवेदी ने एक पुस्तक दी, जिसमें भगवती बाबू के बारे में कुछ जानकारी थी। उन्होंने बताया कि पिछले साल चार दिसंबर को 30 साल इंतजार के बाद प्रदेश सरकार के मंत्री मोहसिन रजा और अर्चना परिषद के प्रयास से पार्क का लोकार्पण हुआ और भगवती बाबू की प्रतिमा लगी। पहले तो वर्मा जी की जयंती पर साहित्यिक गोष्ठी होती थी पर कई सालों से बंद हो गई। अब इस बार फिर आयोजन होगा।
स्टेडियम और प्रतिमा की मंशा
यह सही है कि सफीपुर में बाबू भगवती चरण के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं हुआ। कोशिश करूंगा कि उनके नाम पर सफीपुर मेें स्टेडियम बने और वहां उनकी आदमकद प्रतिमा भी लगाई जाए। इस बार से ही उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर आयोजन किए जाएंगे। उन्नाव में जन्मी हस्तियों की याद में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री को दूंगा।
मोहसिन रजा, हज एवं वक्फ मंत्री
बहुमुखी प्रतिभा को जानिए... वकालत, पत्रकारिता, नौकरी और साहित्यकार
कानपुर के पटकापुर निवासी अधिवक्ता देवीचरण की दो संतानें जन्म के दौरान ही नहीं रहीं तो किसी की सलाह पर वह स्थान बदलकर सफीपुर आकर बस गए। यहीं पर भगवती चरण का जन्म हुआ। जब वह पांच साल के थे, पिता का देहांत हो गया। भीषण आर्थिक तंगी के बीच मां ने भगवती चरण को पढ़ाया। बीए और एलएलबी के बाद कानपुर, हमीरपुर, प्रतापगढ़ में कुछ समय वकालत की।
नौकरी भी की। कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आकर प्रताप अखबार और प्रभा में लेखन किया। 1942 में बांबे टाकीज में काम करने के दौरान फिल्मी दुनिया के संपर्क में आए। तब के जमाने की अभिनेत्री देविका रानी सहित कई मशहूर निर्माता-निर्देशक उनकी लेखनी से प्रभावित थे। 1950 में नवजीवन के संपादक बने। खबरों के लिए दबाव के कारण वहां से त्यागपत्र दिया और लेखन में व्यस्त हो गए। आकाशवाणी में सलाहकार रहे। पद्मभूषण से अलंकृत किए गए। 1971 में राज्यसभा सदस्य बनाए गए।
देश की चिंता
भगवती बाबू ने सीधे तौर पर संग्राम में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन अपनी लेखनी के जरिये व्यवस्था के खिलाफ देश का दर्द उकेरते रहे। उनकी कविता भैंसागाड़ी और उपन्यास टेढ़े-मेढ़े रास्ते में इसकी झलक मिलती है। इस उपन्यास में राजनीतिक विचारधाराओं का विश्लेषण इशारों में है। वह महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल से भी मिले। उनसे आंदोलन के बारे में दिशानिर्देश लिए।
चित्रलेखा पर फिल्म
उनका उपन्यास चित्रलेखा 1934 में प्रकाशित हुआ। उस जमाने में लिखे गए ऐसे धाकड़ उपन्यास की ढाई लाख से अधिक प्रतियां बिक गईं। धर्मवीर भारती का उपन्यास गुनाहों का देवता जितना मशहूर हुआ, उतना ही चित्रलेखा भी। 1941 और 1963 में चित्रलेखा पर फिल्म बनी, जो बेहद सफल रही।
कृतियां
पतन, तीन वर्ष, आखिरी दांव, भूले-बिसरे चित्र, थके पांव, चाणक्य, अपने खिलौने, वह फिर नहीं आई, सीधी सच्ची बातें और रेखा उपन्यास भी हाथोंहाथ लिए गए। दो बांके, मोर्चाबंदी, मेरी कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां जैसे कहानी संग्रह, वासवदत्ता (पटकथा), बुझता दीपक, मेरा शेरा, रुपया तुम्हें खा गया, चलते-चलते, वसीयत जैसे नाटक और निबंध। मानव, प्रेम-संगीत, एक दिन जैसी कविताओं का संग्रह भी खूब पढ़ा गया। इसके अलावा दर्जनों कृतियां। 5 अक्तूबर 1981 को देहांत। उस वक्त उनके दो बेटे उनके पास मौजूद थे।