पिछले साल सितंबर में मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद पूरे पश्चिमी यूपी में जाट मतों से प्रभावित होने वाली दर्जनभर लोकसभा सीटों पर भाजपा को बड़ी सफलता की उम्मीद थी।
मगर लोकसभा चुनावों के ऐन पहले केंद्र सरकार के जाटों को केंद्रीय नौकरियों में आरक्षण्ा के फैसले ने हालात बदल दिए हैं।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को अमरोहा से राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का टिकट देकर अध्यक्ष अजित सिंह ने किसानों और जाटों को जोड़ने का दांव चला है।
इन दो कारकों का असर इस पूरे क्षेत्र में साफ दिख रहा है। असल में बागपत, कैराना, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, अमरोहा, गाजियाबाद, बुलंदशहर, मथुरा, हाथरस, फतेहपुर सीकरी, मुरादाबाद और अलीगढ़ लोकसभा सीटों पर एक लाख से लेकर चार लाख तक जाट वोट हैं।
अजित के लिए कम हुआ जाटों का गुस्साः पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और दंगों में दर्ज करीब 6500 मुकदमों में फंसे लोगों की पैरवी कर रहे अशोक बालियान कहते हैं कि आरक्षण ने अजित सिंह के प्रति जाटों के गुस्से को कम किया है। ज्यादातर जाट मतदाता लोकदल की तरफ लौटा है।