बुधवार रात 12:00 बजते-बजते श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आस्था के सागर में हिलोरे लेने लगा।
ढोल-नगाडे़, झांझ-मजीरा और मृदंग अब तेजी से बजने लगे और प्रतीक्षा के पल खत्म होते ही जयघोष के बीच अजन्मे के जन्म का श्रद्धालुओं के सैलाब ने दर्शन पा लिया।
यह कान्हा का 5239वां जन्मोत्सव है। इस बार वर्षों बाद भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ है।
मध्य रात्रि रोहिणी नक्षत्र में प्राकट्य दर्शन के साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह का दिव्य महा अभिषेक किया गया। इसके लिए दूध, दही, घी, बूरा, शहद, गंगा-यमुना जल से बने पंचामृत का उपयोग किया गया।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान के भागवत भवन में महाअभिषेक की परंपरा इस बार महंत नृत्यगोपाल दास महाराज के साथ जन्मस्थान के ट्रस्टी अनुराग डालमिया ने निभाई। इस दौरान मंत्रोच्चारण और शंख की ध्वनि भागवत भवन में गूंजती रही।
रेशम एवं रत्न जड़ित पीले रंग की पोशाक में ठाकुर जी की छवि निहारते ही बनती थी। उस पर फूल और इत्र की बरसात से संपूर्ण वातावरण सुगंधित हो उठा। भागवत भवन के साथ भक्ति की यही रसधार श्रीकृष्ण जन्मस्थान स्थित मंदिर केशवदेव, गर्भगृह में भी बही।
वैसे तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भक्तों का रेला सुबह से ही दर्शन के लिए आने लगा था। भक्तों ने बुधवार को प्रात: 5.30 बजे मंगला आरती के दर्शन किए। भोर में शुरू हुआ दर्शनों का यह क्रम देर रात तक यूं ही अनवरत चलता रहा।