फोटो नं 12 सीतापुर के लालबाग पार्क स्थित शहीद स्तमभ ।
- फोटो : SITAPUR
सीतापुर। देश में छिड़ चुके अंग्रेजों भारत छोड़ो के आंदोलन से सजीतापुर भी अछूता नहीं रहा। यहां भी अगस्त क्रांति के दौरान आजादी की लड़ाई के योद्धाओं ने ब्रिटानिया हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शहर के लालबाग पार्क (तब मोतीबाग) में 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सभा करने का निर्णय लिया। फिरंगियों ने सभा रोकने के लिए लालबाग में एकत्र होने वालों पर बंदूकों का मुंह खोल दिया और गोलियां देशभक्तों का सीना छलनी करने लगीं। अंग्रेजों ने यहां दूसरा जलियांवाला बाग बना दिया। इस गोलीकांड में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद हो गए। हालांकि, अंग्रेजों ने आठ शहीदों के शव ही दिए।
इस घटना के बाद मोतीबाग पार्क का नाम बदलकर लालबाग कर दिया गया। लालबाग पार्क में स्थित शहीद स्तंभ आजादी के दीवानों की वीरगाथा का गवाह है। उस दौर की यादें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवनरायन लाल शर्मा के जेहन में आज भी ताजा हैं। उन पलों का जिक्र करते-करते वे उदास हो जाते हैं। पर शहीदों के बुलंद हौसलों का बखान करते समय उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंदोलन को देखते हुए प्रशासन ने स्कूल-कालेजों में छुट्टी कर दी थी। देशप्रेम की लौ सभी के दिलों में भड़काने के लिए देशभक्त जिले भर में घूम-घूमकर लोगों को जागरूक कर रहे थे। उस दिन वे स्वयं बिसवां गए थे। रेलगाड़ी से वापस आते वक्त पता चला कि सीतापुर स्टेशन पर पुलिस लगी है। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को गिरफ्तार कर रहे हैं।
स्टेशन के पहले ही वे चलती ट्रेन से कूद गए। आगे बढ़ने पर उजागर लाल कॉलेज के पास एक पेड़ की ओट में छुपे उनके कुछ अन्य साथी भी मिल गए। पास ही पड़े एक डंडे में तिरंगा लगाकर थाम लिया और अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगाते हुए पार्क की ओर कूच कर दिया, लेकिन पार्क पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार हो गए। उधर, काफी देशभक्त पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर पार्क में जा डटे थे। प्रशासन को जानकारी मिली तो तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर कैलाश चंद्र के नेतृत्व में पुलिस ने पार्क को घेर लिया। देशभक्त पार्क में डटे रहे और फिरंगी सरकार के विरोध में नारेबाजी करने लगे। पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया तो आजादी के दीवानों ने पथराव शुरू कर दिया। एक पत्थर डिप्टी कलेक्टर की टोपी पर जा लगा। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने बंदूकों के मुंह खेल दिए। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा शहर थर्रा उठा। एक के बाद एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की लाशें गिरती रहीं। देखते ही देखते यहां दूसरा जलियांवाला बाग बन गया। फिर भी आजादी के परवानों का हौसला नहीं डिगा और इंकलाब जिंदाबाद व अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे धरती से लेकर आसमान तक गूंजते रहे।
चंद्रभाल मिश्रा, मुन्नालाल मिश्रा, रघुवर दयाल, मैकूलाल, मोहर्रम अली, कल्लूराम, राजकिशोर मेहरोत्रा, छेद्दू।
आजादी की लड़ाई के योद्धाओं पर मोतीबाग (अब लालबाग) पार्क में अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही जब गोलियां बरसा रहे थे, उस वक्त दस साल का एक बालक कल्लूराम भी अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगा रहा था। अंग्रेज उस बालक की मासूमियत देख भी नहीं पसीजे। अंग्रेजों की एक गोली कल्लूराम को भी छलनी कर गई।