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धमाके से कारतूस फैक्टरी में लगी आग

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शहर के प्रेम नगर स्थित कॉटेज बनाने की फैक्ट्री में लगी आग से उठती लपटें व क्षतिग्रस्त हुआ मकान। (? - फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। शहर कोतवाली इलाके में बीती देर रात कारतूस बनाने वाली फैक्टरी में धमाके के बाद आग लग गई। भवन से आग की लपटों को उठता देख इसकी सूचना पुलिस और दमकल की टीम को दी गई। सूचना पाकर मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड और दमकल की टीम ने कड़ी मशक्कत कर आग पर काबू पा लिया है। घटना में कोई हताहत नहीं हुआ है। कुछ जरूरी दस्तावेज जल गए हैं। हादसा शॉर्ट सर्किट की वजह से होना बताया जा रहा है।
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शहर कोतवाली इलाके के प्रेमनगर मोहल्ले में पहवा गन हाउस है। इसी कंपनी में 12 बोर की कारतूस बनाई जाती है। पहवा गन हाउस के ऊपर ही कारतूस बनाने की फैक्टरी है। मंगलवार की आधी रात फैक्टरी में अचानक तेज धमाका हुआ और इसके बाद आग लग गई। आग की लपटें उठती देख मोहल्ले के लोगों को जानकारी हुई। सूचना पाकर शहर कोतवाल टीपी सिंह, दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची और कड़ी मशक्कत कर आग पर काबू पाया है।
इस फैक्टरी की देखभाल करने वाले प्रेमनगर के ही निवासी विमल किशोर गुप्ता ने बताया कि कारतूस बनाने के प्रोपराइटर जगमोहन लाल हैं। विमल बताते हैं कि रात में अचानक बारिश होने के बाद बिजली कड़की और इसके कुछ देर बाद फैैक्टरी में आग लग गई। आग लगने से कोई हताहत नहीं हुआ है। समय रहते पुलिस और दमकल टीम की कोशिश से बड़ा हादसा होने से टल गया है।
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वह बताते हैं कि आग लगने से कोई बड़ा नुकसान भी नहीं हुआ है, लेकिन 20 से 25 साल पुराने जरूरी दस्तावेज जलकर खाक हो गए हैं। आग शार्ट सर्किट की वजह से लगने की आशंका है। इस बारे में शहर कोतवाल टीपी सिंह ने बताया कि फैैक्टरी में लगी आग को समय रहते बुझा लिया गया था। कोई हताहत नहीं हुआ है। जांचकर कार्रवाई होगी।
1981 से चल रही है फैक्टरी
कारतूस बनाने वाली फैैक्टरी 1981 से चल रही है। जानकार बताते हैं कि तब प्रेमनगर में उतनी आबादी नहीं थी, इसलिए लाइसेंस मिल गया था, लेकिन अब आबादी बढ़ गई है। हर पांच साल में फैक्टरी का रिनीवल होता है। अभी रिनीवल की तारीख 31 दिसंबर 2021 तक मान्य है।
बताते हैं कि आबादी बढ़ने की वजह से इसके प्रोपराइटर ने फैैक्टरी को वहां से उलजापुर स्थानांतरित कराने के लिए आवेदन कर रखा है। इसकी फाइल शासन को जा चुकी है, लेकिन अभी वहां से स्वीकृत होकर नहीं आई है। इसी वजह से फैक्टरी यहां पर अभी संचालित है। अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृत होते ही फैक्टरी स्थानांतरित हो जाएगी।
डीएम की अनुमति के बाद बनती है कॉटेज
फैक्टरी के जिम्मेदारों का कहना है कि यहां पर कॉटेज बनाई जाती है, लेकिन बनाने से पहले इसकी अनुमति डीएम से लेनी होती है, जो अभी आर्डर मिलते हैं, उस आर्डर के हिसाब से डीएम से उतनी कारतूस बनाने की अनुमति लेकर कॉटेज बनाकर बेची जाती है।
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