जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के को-एजुकेशन को लेकर दिए गए बयान का विरोध होने पर फिर बयान सामने आया है। मदनी ने कहा कि अंग्रेजों की गुलाम जहनियत से उनके विरोधी अभी भी आजाद नहीं हुए हैं।
बुधवार को मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि जो लोग उनके बयान पर बखेड़ा कर रहे हैं, वास्तव में वह हकीकत से मुंह मोड़ रहे हैं। दारुल उलूम और तब्लीगी जमात को तालिबानी कहने वाले नहीं जानते हैं कि तब्लीगी जमात सियासी नहीं, बल्कि धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाली बेहतरीन जमात है। दारुल उलूम और यहां के उलमा ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया और लड़ते-लड़ते देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। दारुल उलूम को बुरा कहने वाले बताएं कि उन्होंने देश की आजादी के लिए क्या किया।
को-एजूकेशन को लेकर उठाए थे सवाल
जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने को-एजूकेशन को लेकर सवाल उठाए थे। मुस्लिम समाज से बच्चों को इससे दूर रखने को कहा। साथ ही संस्कृति की रक्षा के लिए हिंदू समाज से भी अपील की। दारुल उलूम के मोहतमिम ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए लड़का-लड़की के साथ पढ़ने को गलत बताया।
मौलाना अरशद मदनी ने सह शिक्षा को लेकर दिल्ली में चल रही कार्यसमिति की बैठक में कहा कि लड़का-लड़कियों को एक साथ नहीं पढ़ाना चाहिए। को-एजूकेशन के दुष्प्रभाव से युवा पीढ़ी को बचाना बहुत जरूरी है। सह शिक्षा के नतीजे झकझोर देने वाले हैं। मेरा मानना है कि कोई भी समाज या धर्म बेशर्मी को बढ़ावा नहीं देगा। इसलिए न केवल मुसलमान बल्कि देश में रहने वाले हिंदू भाई भी अपनी तहजीब और संस्कृति को बचाने के लिए सहशिक्षा के खिलाफ आवाज बुलंद करें।
मौलाना अरशद मदनी ने यह भी कहा था कि बेटियों को उच्च शिक्षित बनाने के लिए अलग से शिक्षण संस्थान खोले जाने चाहिए। वहीं, दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने अरशद मदनी के बयान का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि जमीयत ने समाज को गंदगी से बचाने के लिए को-एजुकेशन का विरोध किया है। वह मौलाना अरशद मदनी की बातों से पूरी तरह सहमत हैं।