सहारनपुर। कच्ची शराब में इथाइल अल्कोहल के साथ मिला मिथाइल अल्कोहल इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकता है यदि समय से इलाज ना मिले तो। ऐसे में जरूरी है कि इससे बनी शराब पीने से बचा जाए।
जेवी जैन कॉलेज में रसायन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर लोकेश कुमार ने बताया कि शराब बनाने के लिए शीरे या सड़े हुए फलों का लहन तैयार किया जाता है। जिससे खमीर उठता है। खमीर में दो तरह के बैक्टीरिया बनते हैं। एक बैक्टीरिया लहन को इथाइल अल्कोहल में कनवर्ट करता है, जबकि दूसरा बैक्टीरिया उसे मिथाइल अल्कोहल में कनवर्ट करता है। जब शराब बनाने वाले इसे गर्म करते हैं तो दूसरे कंटेनर या बर्तन में गिरने वाला लिक्विड यानी कच्ची शराब में इथाइल के साथ मिथाइल अल्कोहल भी गिरता है। डिस्टिलरी में भी ऐसा होता है। मगर वहां टेस्टिंग की सुविधा होती है, जिसमें वह मिथाइल अल्कोहल को अलग कर उसे अन्य इस्तेमाल के लिए बेचते हैं और इथाइल अल्कोहल को अलग। मगर गांवों में शराब बनाने वालों के पास टेस्टिंग की कोई व्यवस्था नहीं होती। साथ ही उनको इन बारीकियों का पता भी नहीं होता है। ऐसे में वह अनजाने इथाइल और मिथाइल अल्कोहल मिली शराब को बेच देते हैं या खुद भी पीते हैं। मिथाइल अल्कोहल का सेवन करने से मनुष्य की तबीयत बिगड़ती है। इलाज में देरी होने पर इंसान की मौत भी हो जाती है।
अचेत अवस्था में जाने पर नहीं है इलाज
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर बीएस सोढ़ी ने बताया कि मिथाइल अल्कोहल का सेवन करने वाले व्यक्ति की हालत बिगड़ती चली जाती है। यदि बीमार को समय से इलाज दिया जाए तो उसे पहले इथाइल अल्कोहल में लाना होता है। मगर यदि वह अचेत हो जाता है तो इलाज होना बेहद मुश्किल हो जाता है, जिसमें जान जाने के अधिक चांस रहते हैं। ऐसे में जरूरी है कि कच्ची शराब का सेवन ना किया जाए।