रामपुर। चैत्र नवरात्र इस बार शनिवार दो अप्रैल से प्रारंभ हो रहे हैं। इस बार मां जगदंबा अश्व पर सवार होकर आएंगी। इस बार माता का दरबार पूरे नौ दिन यान 11 अप्रैल तक सजेगा। ज्योतिषविदों के अनुसार मां जगदंबा की आराधना से व्यापार में वृद्धि, घर में सुख-समृद्धि एवं शत्रुओं की पराजय होती है। सनातन धर्म में शारदीय नवरात्र की तरह चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व है। घरों एवं देवी मंदिरों में श्रद्धालु मां जगदंबा की पूजा-अर्चना करते हैं। कई देव स्थलों पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवरात्र प्रारंभ हो रहे हैं। इस बार मां दुर्गा अश्व पर सवार होकर आएंगी।
नवरात्र में कलश स्थापना के लिए सही तिथि और मुहूर्त का बड़ा महत्व होता है। वैसे तो पूरे दिन भर कलश स्थापना की जा सकती है, लेकिन प्रतिपदा तिथि में ही कलश स्थापना का विशेष विधान है। पंचांग के अनुसार, सूर्योदय से लेकर के दिन में 12 बजकर 28 मिनट तक कलश स्थापित कर लिया जाए तो अति उत्तम होगा। उसमें भी यदि शुभ चौघड़िया प्राप्त हो जाए तो और भी शुभ फल की वृद्धि हो जाती है। सुबह 7 बजकर 30 मिनट से लेकर 9 बजे तक और दोपहर में 12 बजे से लेकर के 12 बजकर 28 मिनट तक शुभ चौघड़िया प्राप्त हो रही है। जो कलश स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त होगा।नवरात्र पर पांच दिन सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा, जो समस्त शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ है। तीन, पांच, छह, आठ व दस अप्रैल को यह योग रहेगा। श्रीत्रिपुरेश्वरी शक्ति पीठ के पीठाधीश आचार्य डॉ. राधेश्याम वासंतेय के अनुसार प्रतिपदा पर भगवान झूलेलाल जी की जयंती, चार अप्रैल को गणगौर, नौ को दुर्गा अष्टमी और दस अप्रैल को रामनवमी का पर्व मनाया जाएगा। चैत्र नवरात्र के साथ ही नया साल विक्रम संवत 2079 प्रारंभ हो जाएगा।
पूजा घर में पूर्व या उत्तर दिशा में घटस्थापना के लिए स्थान चुनें, वहां साफ सफाई करें। उस स्थान को गंगाजल से पवित्र कर लें। उस जगह पर साफ मिट्टी बिछा दें, फिर जौ छिड़कें, उस पर मिट्टी की एक परत डाल दें। अब वहां पर पानी छिड़क दें। अब इसके ऊपर कलश स्थापना करें। कलश में गंगाजल, यमुना, कावेरी आदि पवित्र नदियों का जल भर दें और उसमें एक सिक्का डालें। इस दौरान वरुण देव का मन में ध्यान करें। अब कलश के मुख पर रक्षा सूत्र या कलावा बांध दें। फिर उसके मुख को मिट्टी के एक कटोरी से ढंक दें। उस कटोरी को जौ से भर दें। अब एक सूखे नारियल में कलावा लपेट दें। फिर उसे कलश के ऊपर रखी जौ वाली कटोरी में स्थापित कर दें। कलश को गणपति का स्वरूप मानते हैं. इस वजह से सबसे पहले श्रीगणेश यानी कलश का पूजन करते हैं। इस प्रकार से आप स्वयं ही कलश स्थापना कर सकते हैं। कलश स्थापना के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरुप मां शैलपुत्री का पूजा करें।
नवदुर्गा महोत्सव व्रत में काम आने वाले सामान को लेने लोगों ने बाजार में खरीदारी शुरू कर दी है। बाजारों में भीड़ जुटना शुरू हो गई है। कोरोना संक्रमण का खतरा कम होने से नव दुर्गा महोत्सव पर दो साल बाद बाजार में रौनक लौटी है। जिससे दुकानदारों में अच्छी बिक्री की उम्मीद जगी है। श्रद्धालुओं ने बृहस्पतिवार को दिनभर खरीदारी की। पूजा के सामान की दुकानों पर भारी भीड़ लगी रही। श्रद्धालुओं ने कलकत्ता से आई बैकेलाइट मिट्टी की मूर्तियों और पीतल की मूर्तियों की खरीददारी की। मां के वस्त्र, माला, श्रृंगार का सामान, चूड़ियों, कपूर, रोली, चंदन, हवन सामग्री की भी खरीदारी हुई। मां की अखंड ज्योति, चुंदरी और श्रृंगार तथा मोतियों की माला भी खरीदीं। घट की स्थापना के लिए नारियल खरीदने वालों की भीड़ भी दिनभर लगी रही। व्रत में काम आने वाले कोटू आटा, सिंघाडा आटा, चौलाई, मखाने, नारियल, ड्राई फ्रूट की दुकानों पर भी भारी भीड़ रही। मिस्टन गंज, पुराना गंज, गुरुद्वारा मार्ग, सिविल लाइंस, माता मंदिर रोड, शौकत अली मार्ग, ज्वालानगर, मिस्टनगंज, राजद्वारा मार्ग, सर्राफा बाजार, जौहर मार्ग, टैक्सी स्टैंड, रोड, राधा रोड समेत शहर के बाजारों में भीड़ बड़ गई।