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पैरों में जूते नहीं, बोरे को बनाया बस्ता...दरी पर लिखी जा रही भविष्य की पटकथा

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बीसलपुर के गांव भगवंतपुर के प्राथमिक विद्यालय में जमीन पर बैठकर पढ़ रहे बच्चे। - फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। स्कूली बच्चों के कोमल पैरों में जूते तक नहीं है। यूनिफॉर्म और न ही किताब। बैग नहीं मिला तो बोरे को ही बस्ता बना लिया है। ये तस्वीर है परिषदीय विद्यालय के बच्चों की। स्कूल पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य की पटकथा टाट-पट्टी पर बैठाकर लिखी जा रही है। स्कूलों को तो स्मार्ट बना दिया गया, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के आवश्यकता पड़ने वाले सामान उपलब्ध नहीं है।
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जिले में बेसिक शिक्षा विभाग के 1503 विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें 932 प्राथमिक हैं और 571 जूनियर हाईस्कूल के हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों के मुताबिक 199025 बताई जा रही है। कोरोना काल में स्कूल बंद होने के बाद शासन ने कायाकल्प के काम और अन्य अधूरे कामों को पूरा करने के निर्देश दिए थे, लेकिन हालात नहीं सुधरे। 24 सितंबर से कक्षा छह से आठ और चार सितंबर से कक्षा एक से पांच तक परिषदीय विद्यालय खोल दिए गए। लेकिन स्कूलों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया। जबकि हर साल शिक्षा पर करोड़ों का बजट खर्च किया जाता है। मगर अफसरों की सुस्ती और लापरवाही से इन स्कूलों में पढने वाले बच्चों को न तो ड्रेस मिल रहीं न किताबें। बावजूद इन बच्चों का जुनून देखिए इन्हें फर्क नहीं पड़ता। पैरों में जूते हैं या नहीं पीठ पर बस्ता है या नहीं इन्हें तो बस पढ़ना है। इन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। कोरोना ने सभी कमर तोड़कर रख दी। सबसे ज्यादा गरीब तबके के लोगों पर पड़ा है। इसलिए उनके बच्चे अगर स्कूली बैग फट गया तो वह पन्नी थैले को ही बस्ता बन लिया।
60 फीसदी किताबों का ही हो सका है वितरण
स्कूल खुलने के बाद चंद किताबें शासन से भेजी गई थी। किताबें मिलने के बाद विभाग के अफसर और कर्मचारियों ने किताबें बांट दी। लेकिन जिले में अभी तक सिर्फ 60 फीसदी ही किताबों का वितरण हो सका है। जबकि जिले में बच्चों की संख्या करीब दो लाख से भी अधिक है, इनमें 199025 परिषदीय स्कूल के बच्चों की है। विभाग का तर्क है कि जितनी किताबें आई थी। उनका वितरण कर दिया गया है, अब आगे किताबें मिलेंगी तभी वितरण होगा।
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कायाकल्प का भी नहीं शुरू हो सका काम
शहरी क्षेत्र में चलने वाले विद्यालयों में तो कायाकल्प का काम भी पूरा नहीं हो सका है। बच्चों के पढ़ाई के संसाधन तो दूर की बात है। जबकि शहर के अधिकांश विद्यालय जर्जर हालात में हैं। जो कभी भी हादसे का सबब बन सकते हैं। डीएम की ओर से कायाकल्प करने के लिए काफी पहले आदेशित कर दिया था, लेकिन अभी तक कायाकल्प के कामों शुरु करने की कवायद नगरपलिका की ओर से शुरु नहीं हो सकी है।
शासन की ओर से ड्रेस और जूते और मोजे के लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं आए हैं। किताबों की खरीदारी की प्रक्रिया होने के बाद लगभग 70 फीसदी स्कूलों में वितरण भी कर दिया है। जल्द ही अन्य प्राथमिक विद्यालयों में भी पुस्तक मिलते ही वितरण कराया जाएगा। - चंद्रकेश सिंह बीएसए
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