आसाराम को गोली मारने के हो गए थे आदेश
मुजफ्फरनगर, चरथावल। अंग्रेजी हुकूमत में दूधली के स्वतंत्रता सेनानियों का जोश और जज्बा फिरंगियों की आंख की किरकिरी बन गए था। आजादी के आंदोलन में जिले में इस गांव का इतिहास स्वर्णिम है। दो बार जेल गए महाशय आसाराम शर्मा को ब्रिटिश ट्रेन लूटने के मामले में अंग्रेजों ने गोली मारने के आदेश किए थे। उन पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया था।
आजादी की लड़ाई में ब्लॉक के रणबाकुरों में देशभक्ति का जोश भरा था। आजादी की लड़ाई के वक्त चरथावल सहित कई गांव स्वाधीनता के सिपाहियों का केंद्र रहा। दूधली के आसाराम शर्मा को अंगरेज अफसरों ने जलालाबाद स्टेशन फूंकने समेत तीन मामलों में वांछित किया। उनको देखते ही गोली मारने के आदेश थे। उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 500 रुपये का इनाम घोषित था। 12 अप्रैल 1942 में उनके ऊपर डेढ़ साल की सजा और 150 रुपये जुर्माना लगा।
गिरफ्तारी के बाद वर्ष 1943 की 22 अप्रैल को उन्हें मुजफ्फरनगर जिला जेल से बरेली कारागार ट्रांसफर कर दिया। उनके पौत्र रिटायर्ड कोर्ट नाजिर सुबोध बताते हैं कि अपील मंजूर होने के बाद उन्हें छोड़ा नहीं गया, बल्कि सालों तक नजरबंद कर दिया। वह गुलामी के दौर में बाबा पर अंग्रेजों के जुल्म और अन्याय के संस्मरण याद आते ही सिहर उठते है। बकौल कैराना का लाल चौक उनके बाबा का नाम उनके संघर्ष का गवाह है।
खादी आंदोलन में उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। उन्होंने जिले के कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। उन पर सात मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें चार में बरी हो गए थे। उनका नाम आते ही गांव के युवा उदय सिंह पुंडीर, सुमित कुमार, सोहनवीर सिंह आदि में जोश से भर जाते है।
वतन को समर्पित रहा चुन्ना लाल जैन का जीवन
चरथावल के बाशिंदे चुन्ना लाल जैन आज भले हमारे बीच नहीं हों, पर उनकी राष्ट्र भक्ति की अनूठे संस्मरण युवाओं के लिए आदर्श है। उनका नाम आजादी के इतिहास में सुनहरे पन्नों पर दमक रहा है। वतन को समर्पित उनका जीवन व्यक्तिगत सत्याग्रह में उन्हें छह महीने की सजा हुई। देश प्रेम की भावना कूट कूूट कर भरीं थी। उन्होंने युवाओं के जत्थे में शामिल होकर गोरों का खदेड़ने में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। फिरंगियों ने इसे अपराध मानते हुए गिरफ्तार किया और 18 महीने का कारावास और 200 जुर्माने की सजा हंसते हंसते काटी। राष्ट्र निर्माण के कार्य के लिए उन्होंने एक बार पेंशन नहीं लीं। उनके पुत्र सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. आरके जैन बताते है, आजाद भारत में 22 सितंबर 1947 को उनके पिता चुन्ना लाल को जिला मजिस्ट्रेट बीपी साही ने देश में हो रहे दंगे पर नियंत्रण एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष मजिस्ट्रेट बनाया था। बुजुर्ग समाजसेवी ब्रह्मप्रकाश गर्ग बताते हैं चुन्ना लाल जैन से कस्बे की शिक्षण संस्थाओं में लंबे समय तक सेवाएं दी थीं।
दूधली के अतीत की स्वर्णिम गाथा भरती है जोश
चरथावल। दूधली निवासी सरदार महाशय सिंह के पौत्र रविंद्र कुमार बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ सरदार सिंह के मन में ज्वाला भड़क उठी थी। उन्होंने अपने गांव में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सेना खड़ी की। सेना के साथ वह स्वयं 129 बीडीआर के द्वारा जेल गए। मौजूदा वक्त में गांव में कोई स्वतंत्रता सेनानी जीवित नहीं है। दूधली के अतीत की स्वर्णिम गाथा आज भी युवाओं में जोश भरती है। अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा देते हुए वर्ष 1942 में उनके बाबा आसाराम शर्मा के अलावा गांव के सरदार सिंह, श्याम सिंह, रघुवीर सिंह, जयमल मास्ट, मल्लू, टीका सिंह आदि तीन दर्जन से देशभक्त स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे।
प्रमोद शर्मा पौत्र आसाराम शर्मा दूधली- फोटो : MUZAFFARNAGAR
चुन्ना लाल जैन स्वतंत्रता सेनानी चरथावल (फाइल फोटा)- फोटो : MUZAFFARNAGAR
डा.आरके जैन पुत्र चुन्ना लाल जैन- फोटो : MUZAFFARNAGAR
सरदार महाशय सिंह स्वतंत्रता सेनानी दूधली (फाइल फोटो)- फोटो : MUZAFFARNAGAR
रविंद्र कुमार पुत्र स्व. सरदार महाशय सिंह- फोटो : MUZAFFARNAGAR