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संसद में छह बार बदले हाथी के ‘महावत’, फिर भी एक सीट पर सिमटी बसपा

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गठबंधन की संजीवनी से लोकसभा की दस सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बसपा ने एक बार फिर संसद में अपना महावत बदल दिया है। करीब 34 महीनों में बसपा ऐसा एक दो नहीं, बल्कि छह बार अपना संसदीय दल का नेता बदला है। पार्टी दस में से चार पर दांव लगा चुकी है। हालांकि इस बदलाव का विधानसभा चुनाव में कोई असर देखने को नहीं मिला। पार्टी सिर्फ एक सीट ही जीत पाई।
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लोकसभा चुनाव 2019 में प्रदेश में सपा और बसपा का गठबंधन रहा। बसपा ने लोकसभा चुनाव में दस सीटों पर जीत दर्ज की। इसमें मंडल की अमरोहा, बिजनौर, नगीना समेत गाजीपुर, घोसी, सहारनपुर, श्रावस्ती, आंबेडकरनगर, लालगंज और जौनपुर शामिल हैं। हालांकि चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया था। वर्ष 2014 की तुलना में 2019 का प्रदर्शन बसपा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं था।
लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन से उत्साहित मायावती की नजर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर रहा। इसको ध्यान में रखते हुए लोकसभा में संसदीय दल के नेता बदलते रहे। मुस्लिमों मतदाताओं को रिझाने के लिए पहले कुंवर दानिश अली को संसद में पार्टी की कमान सौंपी। बाद में श्याम सिंह यादव को संसदीय दल का नेता बनाकर सपा पर निशाना साधा। वहीं, ब्राह्मण मतदाताओं पर डोरे डालने के लिए आंबेडकर नगर केसांसद रितेश पांडेय पर भी दांव लगाया। हालांकि बसपा के बदलाव विधानसभा चुनाव पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए। पिछले विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीतने वाली बसपा इस चुनाव में एक सीट पर सिमट कर रह गई। इस प्रदर्शन के बाद मंगलवार को बसपा सुप्रीमो मायावती ने रितेश पांडेय को हटाकर गिरीश चंद जाटव को दोबारा संसदीय दल का नेता बना दिया।
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अब बसपा के बने संसदीय दल के नेता
कुंवर दानिश अली, सांसद अमरोहा
श्याम सिंह यादव, सांसद जौनपुर
रितेश पांडेय, सांसद आंबेडकर
गिरीशचंद जाटव, सांसद नगीना
नोट: कुंवर दानिश अली और गिरीशचंद्र जाटव दो बार बसपा संसदीय दल के नेता बने।
विधानसभा चुनाव में सांसदों को नहीं मिली कोई जिम्मेदारी
मुरादाबाद। वैसे तो बसपा मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए संसदीय दल नेता बदलती रही, लेकिन विधानसभा चुनाव में इन सांसदों को पार्टी की ओर से कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई। सूत्रों के मुताबिक किसी भी सांसद को प्रभारी की जिम्मदारी नहीं सौंपी गई।
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