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पुण्यतिथि पर विशेष: ...जब बाबा टिकैत की ढाल बनी ‘सिसौली’, हरी टोपी देख कांपने लगती थीं सरकारें

Fri, 15 May 2020 01:36 PM IST
कपिल kapil राजदीप जाखड़, अमर उजाला, मेरठ

सार

  • जीवनभर किसानों के लिए हुकूमत से टकराते रहे बाबा महेंद्र सिंह टिकैत
  • टिकैत जैसा कोई किसान नेता नहीं
  • नई दिल्ली के वोट क्लब पर लाखों किसानों की भीड़ पहुंची थी
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बाबा महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर विशेष - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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महेंद्र सिंह टिकैत जैसा कोई किसान मसीहा शायद ही कोई हुआ हो। किसानों के मध्य उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि बना ली थी कि उनकी एक आवाज पर लाखों किसान इकट्ठा हो जाते थे। उन्होंने कई किसान आंदोलनों को अंजाम दिया। फिर चाहे गन्ना मूल्य की समस्या रही हो या फिर पानी की। किसानों के मध्य उन्हें बाबा टिकैत के नाम से जाना जाता था। उनके हुक्के की गुड़गुड़ाहट की आवाज से अच्छे-अच्छे अधिकारी पीछे हट जाते थे। 

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चौधरी टिकैत ने कहा था कि सरकार की गोली और लाठी किसान की राह नहीं रोक सकते। किसानों के हित के लिए टिकैत सरकार से कई बार नाराज हुए। किसानों के लिए उन्होंने सरकार से कई बार आमना-सामना किया। टिकैत का प्रभाव सूबे से लेकर देश की राजनीति तक था, लेकिन उन्होंने किसान आंदोलन को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा। किसानों के प्रति अपने आप को समर्पित करते हुए चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने 15 मई 2011 को अंतिम सांस ली। उनके निधन पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राजनेताओं और किसानों तक ने गहरी संवेदना व्यक्त की थी। किसानों के बीच वह आज भी जिंदा हैं। उन्होंने किसानों को एकजुट करने के लिए भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) की नींव रखी, जिसकी कमान उनके पुत्र नरेश टिकैत के हाथ में हैं।
 
कोरोना संकट काल में भी देशवासियों के लिए निरंतर खाद्यान आपूर्ति कर रहे किसानों के लिए ये पहला मौका होगा जब वे अपनी जान से प्यारे किसान मसीहा और भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक बाबा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि सार्वजनिक रूप से नहीं मना पाएंगे। भाकियू और तमाम किसान संगठनों ने उनकी पुण्यतिथि घर पर ही हवन और शांतिपाठ के साथ मनाने का निर्णय लिया है। 
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आखिर किसान अपने मसीहा को क्यों न याद करें, वह शख्सियत ही ऐसे थे। मरते दम तक वह किसानों के हक के लिए लड़ते रहे। केंद्र और राज्य सरकारों से टकराते रहे। उनके जाने के बाद अब जब भी कोई आंदोलन होता है तो किसानों को बरबस ही उनकी याद आ जाती है। टिकैत ने किसानों को अपने हक के लिए लड़ना सिखाया। किसानों में पैणी की ठोड़ पर अधिकार लेने का जज्बा पैदा किया, वह कभी झुके नहीं। जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आए जब किसान और सरकार आरपार की लड़ाई के लिए आमने-सामने आ गए। लेकिन हर बार बाबा ने सरकारी प्रलोभन ठुकराकर किसानों को चुना। 

जब बाबा की ढाल बनी ‘सिसौली’
बसपा शासनकाल में बिजनौर में भाषण के दौरान बाबा टिकैत के मुंह से मुख्यमंत्री मायावती के लिए कोई अपशब्द निकल गया। इसकी गूंज लखनऊ तक पहुंच गई। मुख्यमंत्री ने टिकैत की गिरफ्तारी के आदेश दिए। फोर्स ने सिसौली को चारों ओर से घेर लिया। किसानों ने टिकैत को अपने घेरे में लेकर सड़कों पर बुग्गी, ट्रैक्टर-ट्रॉलियां आदि खड़े कर नाकेबंदी कर दी। प्रशासन और किसानों में टकराव की नौबत आ गई थी। कई पार्टियों के नेताओं ने मध्यस्थता कर प्रशासन के माध्यम से बात ऊपर तक पहुंचाई। टिकैत बिजनौर कोर्ट में सरेंडर को तैयार हो गए। उस समय टिकैत ने तत्कालीन एडीजी से कहा था। उन्होंने कभी कोर्ट में समर्पण नहीं किया, लेकिन वह इलाके में अशांति नहीं चाहते हैं। वह बिजनौर कोर्ट में पेश हुए, इत्तेफाक से उन्हें कोर्ट से उसी दिन जमानत मिल गई।

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वोट क्लब पर लाखों किसानों की भीड़ 
25 अक्तूबर, 1988 को नई दिल्ली के वोट क्लब पर किसान पंचायत हुई। इस पंचायत में 14 राज्यों के किसानों ने भाग लिया। करीब तीन लाख लोग धरने पर मौजूद थे। बाबा टिकैत के नेतृत्व में 12 सदस्यीय कमेटी ने राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ से मुलाकात की, कोई निर्णय नहीं हो सका। सत्तारूढ़ कांग्रेस को अपनी रैली वोट क्लब के बजाय लाल किला मैदान पर करनी पड़ी थी। इस रैली में भाग लेने जा रहे गांव कुटबी के राजेंद्र सिंह और टिटौली के भूप सिंह लोनी बार्डर पर पुलिस की गोली से शहीद हो गए थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा भाकियू की सभी मांगों पर फैसला लेने का आश्वासन देने पर वोट क्लब से धरना समाप्त हुआ। मेरठ में कमिश्नरी पर 27 जनवरी, 1988 से 19 फरवरी तक आंदोलन चला था। ऐसे धरने प्रदर्शन बाबा टिकैत की याद आज भी ताजा रखते हैं।

जब हरी टोपी देख कांपने लगती थीं सरकारें

सूबे के जनपद मुजफ्फरनगर के गांव सिसौली में छह अक्टूबर 1935 को जन्मे एवं सभी धर्मों और जातियों के किसानों के दिलों पर राज करने वाले चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के जीवन पर किसान मसीहा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विचारधारा की अमिट छाप थी। राष्ट्रीय लोकदल के संगठन महामंत्री डॉ. राजकुमार सांगवान बताते हैं कि चौधरी साहब के जीवन और संघर्षों से प्रेरणा लेकर बाबा टिकैत अराजनीतिक संगठन के रूप में 17 अक्तूबर 1986 को अस्तित्व में आई भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर मनोनीत हुए। 

उन्होंने किसानों की मुख्य मांग बिजली, सिंचाई व फसलों के दाम की मांगों को जोरों से उठाना शुरू कर दिया। बाबा टिकैत ने गांवों में रहने वाले खेत-खलिहानों में लगे राजनीति से दूर किसान वर्ग को ताकत का अहसास कराया। उनका यह अभ्यास इतना मजबूत साबित हुआ कि सरकारें हरी टोपी देख कांपने लगती थीं। प्रशासन हाथ जोड़े टिकैत के योद्धाओं के सामने गिड़गिड़ाने लगता था। यही वह अवसर था जब टिकैत ने आंदोलनों के माध्यम से प्रदेश एवं देश की सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। यह स्थिति इतनी प्रबल होकर उभरी थी कि किसान और खेतिहर मजदूरों का शोषण नहीं हो सका था। बाबा टिकैत ने उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों में फसलों के उचित दाम, सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था का लाभ किसानों को दिलाया।

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