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चुनावी रण: बदल देते हैं सरकारें...दम रखते हैं चुनावी नारे, चुनाव प्रचार के मैदान में नेता तुकबंदी का सहारे

Tue, 09 Apr 2024 05:37 PM IST
Dimple Sirohi अरीश रिज़वी, अमर उजाला, मेरठ

सार

लोकसभा चुनाव में महज कुछ ही दिन बाकी हैं। चुनावी प्रचार में नेता और मंत्री जुटे हैं। खूब नारे लगाए जा रहे हैं। चुनाव में नारों की बड़ी भूमिका रही है। ये नारे सरकार को बनाने और बदलने का भी दम रखते हैं। इस पर एक रिपोर्ट।
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चुनाव प्रचार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देख चुनावी ढंग, वोटर सारे दंग

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नारे बने हथियार, मची हुई है जंग
होकर ऊपर नीचे,    इक दूजे की टांगें खींचे
वोटर का कोई सगा नहीं, सब कुर्सी के पीछे। 

जिस तरह एक तस्वीर हजार शब्दों पर भारी होती है, वैसे ही छोटे छोटे चुनावी नारे, लंबे भाषणों पर भारी पड़ते हैं। बिना नारों के चुनाव कुछ ऐसे ही लगता है कि जैसे कोई सेना बिना असलहे के युद्ध में उतर गई हो। कई चुनावी नारे विवादित भी रहे हैं, पर लहर पैदा करके अप्रत्याशित नतीजे दिलाने का दम रखते हैं। 

इस लोकसभा चुनाव में नारों के सहारे जनता में पैठ बनाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा के नारे हैं, अब की बार 400 पार। मोदी की गारंटी। फिर से मोदी सरकार।  सपा-कांग्रेस गठबंधन का नारा है, होगा पीडीए का नाम, अबकी एकजुट मतदान। 

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आम आदमी पार्टी का का नारा है, जेल का जवाब वोट से 
-पहले के नारों की बानगी देखिए। समाजवादी पार्टी के नारे रहे हैं, जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। जीत की चाभी, डिंपल भाभी। यूपी की मजबूरी है, अखिलेश यादव जरूरी है। 
-बसपा के नारे महिलाओं को आकर्षित करने के लिए बनाए गए थे। बेटियों को मुस्कुराने दो, बहन जी को आने दो। इसी तरह डर से नहीं हक से वोट दो, बेइमानों को चोट दो। 
-हालांकि विधानसभा हो या लोकसभा। पिछले एक दशक से भाजपा के नारे सब पर भारी पड़ रहे हैं। गली-गली में मचा है शोर, जनता चली भाजपा की ओर। जन-जन का संकल्प, परिवर्तन एक विकल्प। जनता ने इन नारों पर रीझकर भाजपा को देश और सूबे में प्रचंड बहुमत भी दिया। 

 

खास और पुराने नारे...
भाजपा का नारा (राम मंदिर आंदोलन के वक्त): राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे
बसपा का नारा: चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर
सपा का नारा: जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है
 

जिताऊ नारे 
1965: जय जवान, जय किसान, कांग्रेस
1967: समाजवादियों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावै सौ में साठ (सोशलिस्ट पार्टी)
1971: गरीबी हटाओ (कांग्रेस)
1975-1977: सिंहासन खाली करो   कि जनता आती है (सोशलिस्ट पार्टी/जनता दल)
1978: एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर (कांग्रेस)
1984: जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा (कांग्रेस)
1989: राजा नही फकीर है, जनता की तकदीर (कांग्रेस)
1989: सेना खून बहाती है, सरकार कमीशन खाती है (जनता दल/बीजेपी)
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ये भी रहे लोकप्रिय   
-इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं
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-स्वर्ग से नेहरू रहे पुकार, अबकी बिटिया जइयो हार
-इंदिरा लाओ देश बचाओ
-आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे
-सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे
-अबकी बारी अटल बिहारी
-सोच ईमानदार, काम दमदार, फिर एक बार भाजपा सरकार, सौ में साठ हमारा है, चालीस में बंटवारा है, उसमें भी हमारा है
-यूपी का ये जनादेश, आ रहे हैं अखिलेश
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