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ढोल मंजीरा बजाकर गांव में कार्यकर्ता गाते थे चुनावी गीत

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पहले चुनाव के प्रचार का नाना प्रकार के तरीके अपनाते थे। कहीं नारे लगाए जाते थे तो कहीं लोगों से मेल मुलाकात किया जाता था। उन्हीं में एक तरीका वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग होता था। ऐसे में पहले ढोल-मंजीरे के साथ कार्यकर्ता चुनावी गीत गाते हुए गांव-गांव तथा गलियों में घूूमा करते थे। आज उनकी जगह कान फाड़ू डीजे और लाउडस्पीकर ने ले ली है। वर्ष 1971 में पहली बार मतदान करने वाले मधुबन तहसील के दिघेड़ा निवासी 71 वर्षीय राम नारायण सिंह ने बताया कि वर्तमान और पहले के चुनावी माहौल में बहुत बदलाव आ गया है। पहले का चुनाव को लेकर प्रत्याशी के अलावा लोगों में काफी उत्साह होता था। लेकिन वर्तमान चुनाव का प्रचार का तरीका बदल चुका है।
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आज सोशल मीडिया पर प्रचार प्रचार नए-नए तरीक से हो रहा है। पहले गांव में आपसी सामंजस्य था, मुखिया के कहने पर पूरा गांव वोट करता था। उम्मीदवार की जीत के लिए पूरा गांव मेहनत करता था। बोले कि पहले कोई भी चुनाव लड़ सकता था, लेकिन आज का चुनाव के लिए धनबल का होना जरूरी है। कहा कि अब चुनाव में एकता नजर नहीं आती है। बड़ी संख्या में उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए खड़े होते हैं। अब के उम्मीदवार भी अब लोगों से ज्यादा मेल-मिलाप नहीं रखते हैं। जबकि पहले के उम्मीदवार साइकिल से ही घर घर जाकर अपना प्रचार बड़ी सादगी से करते थे। वर्तमान में चुनाव प्रचार सोशल मीडिया पर ज्यादा और जमीनी स्तर पर कम नजर आता है। एक समय था जब नेताजी के स्वागत में ग्रामीण गुड़ का शरबत पिलाते थे। लेकिन अब यह सब देखने को नहीं मिलता।
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