ललितपुर। पर्यावरण के सजग प्रहरी पेड़-पौधे एवं पशु-पक्षी ही होते हैं। उनका संरक्षण करना मानव का धर्म है। कोरोना महामारी ने मानव को आगाह कर दिया कि मूक प्राणियों की हत्या करने के दुष्परिणाम बहुत ही भयाभय हुए हैं। एक से सात अक्तूबर तक चल रहे वन्य प्राणी सप्ताह के अंतर्गत शिक्षाविदों एवं करुणा प्रेमियों की वर्चुअल संगोष्ठी हुई।
वक्ताओं ने कहा कि वन्य जीवों की कम हो रही संख्या चिंतनीय विषय है। प्राणियों की कम होती संख्या हमें आगाह कर रही है कि वन्य प्राणियों का संरक्षण करना होगा तभी वन्य प्राणी सुरक्षित बचेंगे। सन 1955 में वन्यजीव दिवस मनाया गया था जिसे बाद में 1957 में वन्य जीव सप्ताह के रूप में मनाया जाने लगा। ताकि लोग जागरूक होकर वन्य प्राणियों का संरक्षण करें।
नेहरू महाविद्यालय के मनोविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि सरकार ने भारतीय वन्य जीव प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने के उद्देश्य से वर्ष 1952 में भारतीय वन्य जीव बोर्ड की स्थापना की थी। वन्य जीवों से ही प्रकृति के संतुलन का निर्माण होता है।
करुणा इंटरनेशनल के संयोजक पुष्पेंद्र जैन का ने कहा कि प्रकृति को सुरक्षित रखने के लिए मानव व वन्य प्राणियों का सह अस्तित्व बनाए रखना आवश्यक है। शिक्षक इंदर सिंह पटेल का कहना है कि वर्तमान समय में प्राकृतिक वन क्षेत्रों की संख्या दिनोंदिन घटती जा रही है। जैन शिक्षक सामाजिक समूह के संयोजक अंतिम जैन ने कहा कि वन्य जीवों के बिना हमारा जीवन भी अधूरा रह जाएगा।