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कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी

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कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी
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ललितपुर। मातृभाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है। मातृभाषा के बिना, किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। भारत के लिए एक बड़ी ही मशहूर कहावत है, कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी।
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21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यानी अपनी वाणी का सम्मान करने के दिन के रुप में इसे दुनियाभर के लिए मनाते हैं। इस अवसर पर करुणा इंटरनेशनल ललितपुर व मड़ावरा केंद्र की एक वैचारिक गोष्ठी अक्षय अलया की अध्यक्षता में आयोजित की गई। गोष्ठी में उन्होंने बताया कि यह अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ढाका विश्वविद्यालय के उन छात्रों को समर्पित है, जो बांग्ला भाषाओं को मान्यता देने की लड़ाई में मार दिए गए थे। दुनिया भर में बोली जाने वाली 25 फीसदी भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक हजार से भी कम लोग बोलना जानते हैं। सन 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती हैं। भारत में फिलहाल 1365 मातृभाषाएं हैं, जिनका क्षेत्रीय आधार अलग-अलग है। महामंत्री ध्रुव साहू ने कहा कि कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी जैसी पहचान वाला देश भारत सिर्फ इन भाषाओं को ही नहीं खो रहा है, बल्कि इनके साथ जुड़ी अपनी पहचान से भी दूर होता जा रहा है। यही नहीं दुनियाभर में ऐसी 2500 से भाषाएं हैं, जो खत्म होने की कगार पर पहुंच गई हैं। डा. सुनील संचय ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। यूनेस्को ने इस दिवस को मनाने के लिए 17 नवंबर 1999 को स्वीकृति दी थी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देना है। यूनेस्को द्वारा इस दिवस की घोषणा से बंग्लादेश में पहले से चल रहे बांग्ला भाषा आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली। बंग्लादेश में आज के दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। सेवानिवृत्त प्रवक्ता रमेशचंद्र जैन ने कहा कि प्राचीन भारत में पाली, प्राकृत, मागधी, शौरसेनी, संस्कृत तथा द्रविड़ (तेलुगू, तमिल, कन्नड़ आदि) भाषाओं का विकास हुआ। आर्यों की भी प्रमुख भाषा संस्कृत रही। जबकि दक्षिण भारतीयों ने द्रविड़ भाषाओं का प्रयोग किया। प्राचीन काल में भारतीयों ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उपयोग किया। इन्हीं लिपियों में पुराने समय के स्तंभ-लेख, शिला-लेख, तामपत्र तथा प्रशस्ति-लेख आदि लिखे गए। मध्यकाल में भारत में अरबी, तुर्की और फारसी भाषाओं का प्रचलन शुरु हुआ और इसी दौर में हिन्दी (खड़ी बोली) भाषा भी विकसित हुई। हिंदी और फारसी के मेल से ही उर्दू नामक एक नई लोकप्रिय भाषा बन गई। दो शताब्दी पहले ही भारत में अंग्रेजी भाषा का विकास हुआ। लार्ड मैकाले ने इसी आधार पर सन 1835 में भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखी थी। करूणा केंद्र मड़ावरा के संयोजक पुष्पेंद्र जैन ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रत्येक वर्ष इक्कीस फरवरी को मनाया जाता है। पहला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2000 को मनाया गया था। यूनेस्को द्वारा नवंबर 1999 को इस उद्देश्य से इस दिवस की घोषणा हुई थी कि ताकि हर कोई अपनी मातृभाषा का आदर करे तथा वे भाषाएं जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनको बचाने के लिए प्रयत्न किया जा सकें। आलोक रिछारिया ने कहा कि हम सब भारतीयों को राष्ट्र भाषा यानी हिंदी भाषा के विकास व प्रचार प्रसार की वर्तमान समय में महती आवश्यकता है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी मातृभाषा के प्रसार-प्रसार संपूर्ण विश्व में फैलाएं। हमारी मातृभाषा हिंदी ही बने रहे। शीलचंद्र शास्त्री ने कहा कि यूनेस्को द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आंदोलन दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन 1952 से मनाया जाता रहा है। बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। 2008 को अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर महत्त्व दिया था। गोष्ठी का संचालन पुष्पेंद्र जैन ने किया। इस मौके पर अक्षय अलया, शीलचंद्र शास्त्री, डा. सुनील संचय, ध्रुव साहू, आलोक रिछारिया, पुष्पेंद्र जैन, हरिशंकर सोनी, अरुण तिवारी, शैलेष तिवारी आदि उपस्थित रहे।
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