लखीमपुर खीरी। आज के दौर में हिंदी मातृ भाषा की जगह केवल मात्र भाषा ही बनकर रह गई है। इसका कारण हिंदी भाषा को प्रयोग करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाना है। मातृभाषा को उसका सम्मान दिलाने के लिए जरूरत है कि सरकार को संपूूर्ण देश में सिर्फ कहने के लिए नहीं अपितु हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर वैधानिक रूप मेें ससम्मान प्रतिष्ठित कर देना चाहिए।
आज हिंदी मातृ भाषा के बजाय मात्र भाषा बनकर रह गई है। भाषा हमारा उत्थान करती है न कि हम भाषा का उत्थान कर सकने में सक्षम हैं। हिंदी बोलने वालों को अन्य भाषाओं का प्रयोग करने वाले हेय दृष्टि से देखते हैं। यह एक ऐसी भाषा है जिसमें प्रेम है, मातृत्व का भाव है। हमारा अस्तित्व ही हमारी पहचान है। यदि हमें अपनी पहचान बनानी है तो हिंदी को बोलचाल के साथ कार्य की भाषा भी बनाना होगा। हिंदी भाषा की शुद्धता का ध्यान रखना ही हिंदी का सम्मान है। जितने भाव और विविधताओं का परिचय हमारी हिंदी भाषा प्रदान करती है अन्य किसी भाषा में संभव ही नही। हिंदी हमारी संस्कृति का हिस्सा है।
- प्रोफेसर ज्योत्सना गुप्ता, श्रीराम रत्न शास्त्री महाविद्यालय, गनेशपुर
भाषा का एक संस्कार है। जब इसे व्यक्ति अपने संस्कार में ढाल लेता है तो वह सर्वमान्य और सर्वग्राही हो जाती है। अब तक हिंदी भारतवासियों की संस्कार भाषा नहीं बन पाई है। जब तक हम सब हिंदी को उसके वास्तविक स्वरूप में अपने व्यवहारिक जीवन में स्थान नहीं देंगे, तब तक हिंदी व्यवहारिक आचार-विचार का माध्यम नहीं बन सकती। अब समय आ गया है जिस तरह जम्मू कश्मीर से धारा-370 हटा कर समरूपता का परिचय दिया गया और सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का आदेश दिया। उसी तरह पूरे देश में सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर वैधानिक रूप मेें ससम्मान प्रतिष्ठित करने की जरूरत है। तभी हमारी हिंदी भाषा माता भी और राजरानी भी कहला पाएगी।
- डॉ. वेद प्रकाश अग्निहोत्री, कवि एवं प्राचार्य, जीवनलाल कमला देवी कन्या डिग्री कॉलेज गोला