लगता है कि इतिहास की किताबों को दोबारा लिखने की जरूरत पड़ने वाली है। आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. राजीव सिन्हा के दावे सुनकर तो ऐसा ही लगता है। उन्होंने हाल ही में इंपीरियल कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर बड़ा शोध कार्य पूरा किया है।
इसमें सामने आया है कि सिंधु घाटी सभ्यता का विकास बड़ी नदी’ के सूख जाने या स्थानांतरित होने के करीब तीन हजार साल बाद हुआ है। अभी तक यह माना जाता था कि नदी होने के कारण ही उसके किनारे सिंधु घाटी सभ्यता का विकास हुआ है। यह नदी गंगा से भी कई गुना ज्यादा बड़ी मानी जाती थी। रिसर्च में यह भी सामने आया है कि यह सभ्यता पांच हजार पांच सौ साल पुरानी नहीं है बल्कि करीब आठ हजार साल पुरानी है। यह शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेचर कम्युनिकेशन’ में प्रकाशित हुआ है।
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यहां खुदाई करने पर सामने आई हकीकत
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पुराने दावों को किया खारिज, बोले- साढ़े पांच हजार नहीं, आठ हजार साल पुरानी है सभ्यता
प्रो. राजीव सिन्हा और उनकी टीम पिछले दो साल से इस रिसर्च में लगी हुई थी। प्रो. राजीव के मुताबिक उन्होंने राजस्थान के कालीबंध, पंजाब के सिरहीन और हरियाणा के कुणाल में जमीन के अंदर खुदाई करवाई। यहां भी सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार था। ऐसे में यहां की मिट्टी पर शोध किया। इसके अलावा यहां से मिले तथ्यों की जांच हुई। इन्हीं तथ्यों से यह बातें सामने आई हैं।
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छोटी नदियां ही पर्याप्त थीं
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बड़ी नदी नहीं थी तभी विकसित हुई सिंधु घाटी सभ्यता
प्रो. सिन्हा के अनुसार पूर्व में दावे किए गए थे कि सिंधु घाटी सभ्यता का विकास सिंधु और पौराणिक सरस्वती नदी के आस-पास के क्षेत्र में हुआ है जिसका हिस्सा पाकिस्तान और भारत दोनों में ही है। दावा किया गया कि नदी के पानी के चलते ही यहां नगरीय व्यवस्था शुरू हो गई। इस दावे को प्रो. सिन्हा ने अपने रिसर्च का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। उनका कहना है कि बड़ी नदियों के स्थानांतरित और सूख जाने के बाद ही यहां लोग बसना शुरू हुए हैं। उनका कहना है कि जीवन यापन के लिए लोगों को इतनी बड़ी नदी की जरूरत नहीं थी। उस वक्त जनसंख्या कम थी और छोटी-छोटी नदियां ही उनके लिए पर्याप्त थीं।
खराब मौसम के चलते खत्म हुई थी सभ्यता
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आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. राजीव सिन्हा ने किया दावा
पिछले साल ही आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च के जरिए यह साबित किया था कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन खराब मौसम के चलते हुआ था। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों की टीम ने हरियाणा के भिर्राना और राखीगढ़ी में खुदाई करवाई थी। इस खुदाई में जानवरों की हड्डियां, गायों के सींग, बकरियों, हिरन और चिंकारे के अवशेष मिले थे। इन सभी की जांच कार्बन 14 के जरिए जांच कराई गई जिसमें यह पता चला कि उस दौर में सभ्यता को खराब मौसम का सामना करना पड़ा था।
रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्यूनिकेशन ने पब्लिश किया
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डेमो पिक
अभी तक पुराने दावों में सिंधु घाटी के बसने का कारण बड़ी नदियां बताए गए थे लेकिन हमारी टीम ने जो शोध किया है उससे इसके उलट तथ्य सामने आए हैं। इस रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्यूनिकेशन ने पब्लिश भी किया है। अब जब स्थिति साफ है तो पुराने दावों की जगह इतिहास में नए तथ्यों का उल्लेख होना चाहिए।
प्रो. राजीव सिन्हा- अर्थ साइंस डिपार्टमेंट, आईआईटी कानपुर