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राष्ट्रीय खेल दिवस: मुफलिसी में भी कानपुर के खिलाड़ियों ने गाड़े सफलता के झंडे

Sun, 29 Aug 2021 01:32 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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रुखसार बानो (बाॅक्सर) , राहुल यादव (आर्चरी खिलाड़ी) - फोटो : amar ujala
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हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर हर वर्ष 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर आपको ऐसे खिलाड़ियों से रूबरू कराते हैं, जिन्होंने साबित कर दिखाया है कि सफलता सुख सुविधाओं की मोहताज नहीं, बस इरादे पक्के होने चाहिए। बाधाएं लाख आएं, रुको नहीं, लक्ष्य से डिगो नहीं। कामयाबी जरूर आपके कदम चूमेगी। कानपुर की मिट्टी में भी ऐसे कई खिलाड़ी जन्में हैं, जिन्होेंने मुफलिसी में और सुविधाओं के अभाव में पदक जीतकर नाम रोशन किया है। अकेले बेटों ने ही नहीं बेटियों ने भी अपने अटल इरादों से अलग-अलग खेलों में सफलता के पताके लहराए हैं।
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महंगा खेल चुनने का अफसोस, पिता ने भरा दंभ, बेटा जीत लाया पदक
पनकी सुंदर नगर निवासी सिक्योरिटी गार्ड महेंद्र सिंह यादव का बेटा राहुल यादव एमएससी करने के बाद 2017 से निशानेबाजी (आर्चरी) में हाथ आजमाने लगा। अभ्यास के दौरान 2017 में ही पहली राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में मथुरा में शामिल हुआ। पहली प्रतियोगिता में कोई पदक न मिलने का उसे कोई मलाल नहीं हुआ लेकिन महंगा खेल चुन लेने की चिंता जरूर सताने लगी। हालांकि राहुल के पिता ने हिम्मत नहीं हारी और बेटे में अपना खेल जारी रखने का दंभ भरा। राहुल ने अपना अभ्यास और तेज किया। इसके बाद 2018 में भुवनेश्वर में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल हुआ। पिता के साथ ही एसोसिएशन ने उसकी मदद की। इस प्रतियोगिता में राहुल ने रजत पदक जीता। इसके बाद 2019 में भुवनेश्वर में हुई राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी रजत पर निशाना साधा।

धन से गरीब हिम्मत से अमीर ऑटो चालक के बेटे जीत रहे पदक
मोती मोहाल घंटाघर निवासी रोहित जायसवाल की भी माली हालत बहुत सही नहीं है। पिता विनोद जायसवाल ऑटो चलाकर घर का खर्च चलाते हैं। रोहित कबड्डी खिलाड़ी हैं। पांच साल से कबड्डी टीम के कप्तान हैं। छोटा बेटा निखिल जायसवाल बाक्सिंग का खिलाड़ी है। रोहित ने 2017 में राजस्थान में हुई राष्ट्रीय प्रतियोगिता में टीम को स्वर्ण पदक दिलाया था। वहीं, निखिल जायसवाल फरवरी में रोहतक में राष्ट्रीय स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल हुआ था। राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में लगातार दो साल चैंपियन भी रहा। दोनों भाई बताते हैं कि समस्या तब बड़ी हो जाती है, जब लगातार प्रतियोगिताओं में खेलने के लिए बाहर जाना होता है। घर की आर्थिक स्थिति इतनी ठीक नहीं कि इतना खर्च वहन कर सकें। पिता की हिम्मत और एसोसिएशन की बदौलत अभी भी हम लोग डिगे नहीं हैं। लगातार और अच्छा करने का प्रयास जारी है।
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स्वर्ण पदक विजेता वेटलिफ्टर भाई के साथ ठेले पर बेचता है पकौड़ा
किदवईनगर निवासी वेटलिफ्टर अनुज शाह ने भी मुफलिसी के आगे घुटने नहीं टेके। बताते हैं कि पिता की बीमारी से मौत के बाद बड़ा भाई आलोक पकौड़ी का ठेला लगाने लगा। परिवार की जिम्मेदारी उन्हें अकेले उठाते देख उनसे भी नहीं रहा गया। मदद के लिए वह भी भाई के साथ जाने लगा। इससे कम से कम जो दूसरे कामगार को रुपये देते थे, वे बचने लगे। अनुज सुबह जिम जाकर मेहनत करता है, इसके बाद शाम को भाई का हाथ बटाता है। अनुज ने 2017 व 2018 में राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था। 2019 में लखनऊ में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त किया था। 

सगी बहनें साथ-साथ लगा रहीं निशाना, जीत रहीं सोना-चांदी
रावतपुर के गणेश नगर निवासी सूरज शुक्ला की बेटियां वंशिका व कनक शुक्ला ने आर्चरी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। 2018 में शहर में हुई जिला स्तरीय प्रतियोगिता में वंशिका ने स्वर्ण व कनक ने रजत पदक जीता था। 2018 अजमेर में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वंशिका ने स्वर्ण, कनक ने रजत जीता। 2019 में नागपुर में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में दोनों बहनों ने स्वर्ण पदक जीता। उसी वर्ष नेपाल में हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी दोनों ने स्वर्ण पदक पर निशाना साधा था।
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