हमारा देश विविधताओं से भरा है। यहां हर गली, हर कूचे में अजीबोगरीब किस्से-कहानियां सुनने को मिल जाती हैं। देवी-देवताओं से लेकर राक्षसों की पूजा भी होती है। लेकिन यूपी के बुंदेलखंड में एक ऐसा अनोखा रहस्यामय मंदिर बना है जहां लोग किसी देवी-देवता की नहीं बल्कि एक मृत जानवर की समाधि पर पूजा-अर्चना करने हर रोज पहुंच जाते हैं।
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कुतिया महारानी मां का मंदिर
झांसी का रेवन गांव अपने आप में ही काफी अनोखा है। यहां है एक ऐसा मंदिर जिसमें देवी के रूप में एक कुतिया को पूजा जाता है। ये इलाका सूखे की समस्या से हमेशा ही परेशान रहा है। रेवन और ककवारा गांव के बीच यह मंदिर बना हुआ है।
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कुतिया महारानी का मंदिर
लोगों का विश्वास है कि इस मंदिर पर पूजा करने से कुतिया महारानी मां उनकी मनोकामना को पूरा करती है। उनके संकट को दूर कर देती है। दीपावली के दिन इस मंदिर में एक खास पूजा होती है। लोग भयंकर सूखे से बचने के लिए इस मंदिर पर प्रार्थना करते हैं। यहां पर पूजा भी होती है और भजन भी गाए जाते हैं।
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कुतिया महारानी का मंदिर
देश के हर कोने में किसी न किसी देवी-देवता का मंदिर जरूर है। कई जगह तो ऐसे हैं जहां सड़कें कम और मंदिर ज्यादा मिलेंगे। लेकिन यूपी में झांसी के एक गांव में जिस देवी की पूजा की जाती है उनका नाम आपने हर जगह जरूर सुना होगा। झांसी के तहसील मऊरानीपुर में कुतिया महारानी मां का मंदिर है। मंदिर में नियम से पूजा-पाठ भी होता है। इस मंदिर के पुजारी भी हैं जिनका नाम किशोरी लाल यादव है।
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कुतिया महारानी का मंदिर
ये है इस मंदिर की कथा
मंदिर के पुजारी किशोरी लाल यादव ने बताया कि कुतिया देवी मऊरानीपुर तहसील के दो गांवों रेवन और ककवारा के बीच रहती थीं। एक बार दोनों गांव में एक साथ ही भोज का आयोजन हुआ था। भोजन खाने के लिए कुतिया देवी सबसे पहले रेवन गांव पहुंचीं थी, लेकिन वहां खाना नहीं बना था। इसलिए वह ककवारा गांव पहुंची, वहां भी भोजन तैयार होने में समय था। जब दोनों गांव में खाना तैयार नहीं हुआ था, तो कुतिया देवी ने दोनों गांव के बीच एक स्थान पर रुकना तय किया। उसने सोचा कि जिस गांव में पहले भोजन तैयार होगा, वहां संकेत करने वाली तुरही पहले बजेगी।
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यह इशारा मिलते ही वह तुरंत उस गांव में पहुंचकर भोजन कर लेगी, लेकिन दोनों गांव में एक साथ तुरही बजी। दोनों गांवों से बजी तुरही सुनकर कुतिया देवी की मौके पर ही मौत हो गई। जिस जगह पर कुतिया देवी की मौत हुई थी, वहां पर समाधी स्थल बना दिया गया। बाद में वहां पर मंदिर भी बनाया गया, जहां नियम से पूजा होती है।