झांसी। ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी...। गजल गायक जगजीत सिंह की ये गजल जिंदगी की भागदौड़ में उस खूबसूरत बचपन की याद दिलाती है जहां बच्चे दादा-दादी की गोद में छुपकर लुका-छिपी खेलते थे। नाना-नानी परियों और राजा-रानी की कहानी सुनाकर अच्छे-बुरे का फर्क समझाते थे। इसी सीख के साथ नन्हे हाथ जब मुंशी प्रेमचंद्र की ईदगाह और रवींद्रनाथ टैगोर की मास्टर जी व काबुलीवाला बाल साहित्य उठाकर पढ़ते थे तो वो कहानियां हमेशा के लिए उनके कोमल मन में बस जाती थीं, लेकिन आज ये किस्से-कहानियां किताबों में ही दफन होकर रह गए हैं।
आज मोबाइल युग में बच्चे बाल साहित्य पढ़ने समझने से दूर हैं। एकल परिवार में मां-बाप की भागमभाग वाली जिदंगी में मोबाइल बच्चों की लाइफलाइन बन चुकी है। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र झांसी के मनोवैज्ञानिक डॉ. मनीष बताते हैं, उनके परामर्श केंद्र में ऐसे कई केस आते रहते हैं जहां अभिभावक कहते हैं कि बच्चा मोबाइल छीन लेने पर दूध तक नहीं पीता है। पढ़ाई के अलावा बच्चे की जिद के आगे मोबाइल पर गेम खेलने के घंटे तय करने पड़ रहे हैं। अभिभावकों को बताया जाता है कि बच्चों को अच्छी आदतों और बाल साहित्य के किस्से कहानियों की तरफ मोड़ने के लिए बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं, इनडोर गेम्स खेलें, बच्चे को प्रकृति से जोड़ें, इस दौरान खुद भी मोबाइल से दूर रहें।
इंटरनेट साइट्स पर बच्चों को आज भी पढ़ा सकते हैं प्यासे कौवे की कहानी
झांसी। बूट वाला बिल्ला, नन्ही लाल टोपी, बंदर और मोती की माला, भेड़िया और चतुर बकरी, बंदर और बिल्लियां, लालची भेड़िया, खरगोश और कछुआ, टोपीवाला बंदर, खट्टे अंगूर, दो दोस्त और भालू, चतुर नाई, जैसे को तैसा, आलसी गधा, प्यासा कौआ, इच्छापूर्ति, चंपक, सुनहरे बालों वाली सुंदरी, हैंसल और ग्रेटल, जैक और बीनस्टॉक, बूट वाला बिल्ला आदि बाल साहित्य इंटरनेट साइट्स पर उपलब्ध किताबों के रूप में उपलब्ध है।
बोरों में बंद रखी हैं कॉमिक्स
झांसी। स्टेशन, सीपरी बाजार, मानिक चौक और सदर बाजार में किताब की कुछ पुरानी दुकानों पर चाचा चौधरी, स्पाइडरमैन, नागराज, पाताल खजाना आदि कॉमिक्स बोरों में बंद कर रखी गई हैं। दुकानदारों का कहना है कि कॉमिक्स कोई लेने वाला नहीं है।
स्कूल में मोबाइल लेकर आते थे कई बच्चे
झांसी। नन्ही उड़ान, उंगलियों पर आसमान और हाशिये पर धूप जैसी रचनाएं लिखने वाली मऊरानीपुर झांसी की बाल साहित्यकार जमीला खातून बताती हैं कि परियों की कहानी और प्रेरक कथाएं पढ़ने की उम्र में जिस तरह आज बच्चे मोबाइल पर हिंसक गेम्स खेल रहे, बड़ों की तरह वीडियो बना रहे हैं और दिन के कई घंटे मोबाइल चलाने में बिता रहे हैं वो बच्चों के कोमल मन को छोटी उम्र में ही बाहरी चकाचौंध से बांध रहा है। इससे बच्चों में लगाव और चीजों को मन-मस्तिष्क में बैठाने की क्षमता खतम हो रही है। बच्चे गुस्सा दिखाकर मां-बाप से अपनी बात मनवा रहे हैं। प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका रह चुकीं जमीला खातून ने बताया कि स्कूल में कई बार बच्चे मोबाइल लेकर आते थे। ऐसे में उन्हें बालमन से जोड़ने के लिए बाल साहित्य को सहारा बनाकर उनकी इस आदत को छुड़ाने का प्रयास किया गया।
बाल कहानियां तो सुनी ही नहीं, रिश्तों की जगह मोबाइल ने ले ली
झांसी। बुंदेलखंड महाविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के शिक्षक डॉ. सुरेंद्र नारायण का कहना है कि आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी दिन का अधिकांश समय मोबाइल पर बिता रहे हैं। एकल परिवार में मां-बाप अपनी लाइफ में बिजी हो गए हैं। ऐसे में बड़े ही नहीं डेढ़-दो साल के बच्चे भी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, ताऊ और बुआ-मौसी के रिश्तों से दूर हो चुके हैं। बच्चों में रिश्तों की जगह मोबाइल ने ले ली है। बाल साहित्य उन्होंने देखा और जाना ही नहीं। कई बार सुनने में आता है कि बच्चा बिना मोबाइल देखे दूध नहीं पीता है, खाना नहीं खाता है। मजबूरी में मां-बाप को उसे मोबाइल देना पड़ता है। ये स्थिति भविष्य में रिश्तों को लेकर बड़े दुष्परिणाम देगी।