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चाय की प्याली से भी सस्ता है नगर निगम का लाइसेंस शुल्क

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झांसी। आर्थिक तंगी से जूझ रहे नगर निगम को आय बढ़ाने के लिए शासन लगातार निर्देश दे रहा लेकिन, निगम अफसर इसमें कोई दिलचस्पी लेते नहीं दिखते। दुकानों का लाइसेंस बनाना निगम की आय का मुख्य जरिया है, लेकिन इनकी दरों में 30 सालों से कोई बदलाव ही नहीं हुआ। नतीजा यह है कि अब निगम का लाइसेंस चाय की एक प्याली से भी सस्ता हो चुका। वहीं, बेहद मामूली दर होने के बावजूद तमाम प्रतिष्ठान समय पर लाइसेंस फीस अदा नहीं करते हैं।
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निगम सीमा के भीतर चलने वाली सभी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए नगर निगम लाइसेंस बनाता है। शासन ने यह शुल्क तय करने का अधिकार नगर निगम को दिया है। इनके जरिए मिले पैसों का इस्तेमाल शहर के विकास कार्यों में होता है। वर्ष 1994 में नगर महापालिका के दौर में 48 से अधिक मदों के लाइसेंस शुल्क तय हुए। उस दौर के कारोबार एवं महंगाई के अनुपात को देखते हुए यह दरें तय हुई थीं।
होटल, सराय आदि के लिए पांच-दस रुपये प्रतिमाह का शुल्क तय हुआ। सालाना इनको पचास से सौ रुपये लाइसेंस फीस के लिए चुकाना होता है। इतनी ही लाइसेंस फीस आज भी इन प्रतिष्ठानों से लिया जाता है। उस समय बीस रुपये से लेकर अधिकतम सौ रुपये सालाना फीस थी। निगम प्रशासन आज भी इन्हीं दरों पर लाइसेंस शुल्क की वसूली कर रहा है। वहीं, कम शुल्क होने की वजह से तमाम दुकानदार इसे भी समय से नहीं चुकाते। पिछले वित्तीय वर्ष में महज 315 लोगों ने ही लाइसेंस बनवाए।
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सरकारी खजाने को हर साल मोटी चपत
शहर के भीतर हजारों की संख्या में टेंपो-टैक्सी दौड़ रहे हैं लेकिन, इनके भी निगम प्रशासन लाइसेंस नहीं बना सका। इसी तरह निजी बस संचालकों ने भी लाइसेंसिंग फीस नहीं चुकाई। निगम अफसरों की लापरवाही की वजह से सरकारी खजाने को हर साल मोटी चपत लग रही है हालांकि नगर निगम के प्रभारी अधिकारी (लाइसेंस) यह बात स्वीकारते हैं कि दरों के काफी पुराना होने से इस मद की अपेक्षित आय पर प्रभाव पड़ रहा है। उनका कहना है इन दरों को नए सिरे से पुनरीक्षित कराने की कार्रवाई शुरू कराई जाएगी।
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