झांसी। 29 अगस्त को पूरा देश हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का 116वां जन्मदिन मनाएगा। उनकी याद में ध्यानचंद के अपने शहर झांसी में भी बड़े-बड़े आयोजन हो रहे हैं। दद्दा ध्यानचंद के परिवार में भी खुशी का माहौल है। पूरा परिवार उनकी यादों को संजोए जन्मदिन की तैयारी में जुटा है। ऐसे में दद्दा के बेटे अर्जुन एवं यश भारती अवार्ड से सम्मानित अशोक ध्यानचंद ने ‘अमर उजाला’ के साथ अपने पिता ध्यानचंद की उन यादों को साझा किया जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। वह बताते हैं कि दद्दा कच्चे कमरे में रहते थे, नाश्ते में रोज आलू-प्याज की सब्जी और पराठों के साथ एक गिलास दूध पसंद करते थे। अरहर की दाल तो इतनी पसंद थी कि वह इसे हर रोज खाते थे।
भरे-पूरे संयुक्त परिवार में बुआ सूरजा देवी और चाचा-चाची सहित 30 लोग थे। महिलाएं घर में चकिया (आटा चक्की) चलाकर गेहूं पीसती थीं। अशोक ध्यानचंद बताते हैं कि पिता जी को अम्मा के हाथ की बनी अरहर की दाल बहुत पसंद थी। कई दालों को मिलाकर बनने वाली केवटी दाल और मीट भी खूब खाते थे। आलू-प्याज की सब्जी और पराठे का नाश्ता उनकी रोज की आदत थी। बताते हैं कि दद्दा अपनी पत्नी जानकी का नाम नहीं लेते थे, हमेशा उन्हें अरे...सुनो कहकर बुलाते थे। मां और पिता जिस कमरे में रहते थे वह कच्चा कमरा था। उसे गोबर से लीपा जाता था। वर्ष 1936 की बात है जब पिता ध्यानचंद ओलंपिक खेलने जा रहे थे तो अम्मा ने उन्हें घूंघट की ओट से निहारते हुए विदाई दी। पिता जी उन्हें दूर से देखते हुए खेलने निकले थे। वह बताते हैं कि ध्यानचंद बेहद अनुशासन प्रिय और सादगी पसंद थे। सफेद टीशर्ट, पैंट और चमचमाते जूते उनकी पहली पसंद थी। वह जर्मन तानाशाह हिटलर के सामने भी नहीं झुके थे।
घर तक बिजली आने में छह महीने लगे थे
अशोक ध्यानचंद बताते हैं कि झांसी में न्यू रायगंज के इस घर में वह सब पिता ध्यानचंद के साथ वर्ष 1956 में आए थे। तब इलाके में बिजली भी नहीं थी। घर के सामने बिजली का खंभा आने में छह महीने गुजर गए थे। घर में गैस बत्ती और लालटेन जलाई जाती थी। खाना-पीना, सोना-पढ़ना सब दीये और लालटेन में होता था। उनके घर पानी के लिए कुआं भी नहीं था। घर से दूर कुएं पर अम्मा जानकी देवी पानी खींचती थीं और वह सब भाई मिलकर पानी भरते थे। राशन की दुकान में लाइन लगाकर राशन लाते थे।
ऐसे पड़ा हॉकी के जादूगर नाम
अशोक ध्यानचंद बताते हैं कि पिता जी वर्ष 1928 में एम्स्टर्डम में हुए ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम से खेले थे। उस वक्त उन्हें 102 बुखार था। तबीयत बिल्कुल ठीक नहीं थी। उन्हें खेलने से मना किया गया तो उन्होंने कहा कि वह फौजी हैं और कुछ भी हो जाए वह अपने देश के लिए जरूर खेलेंगे। मैच में उन्होंने नीदरलैंड के खिलाफ फाइनल में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। यहीं से लोग उन्हें हॉकी का जादूगर कहने लगे। वहीं, पंजाब इंफैंट्री टूर्नामेंट के फाइनल में अपनी टीम को जीत दिलाने के लिए उन्हें हॉकी विजार्ड नाम से घोषित किया गया। 1956 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
दिलों में यादें आज भी ताजा हैं
‘शहर तो लाहौर का अनारकली बाजार हो रहा है..’
75 वर्ष के सुल्तान अहमद खान बताते हैं कि यह करीब 45 साल पुरानी बात है, जिला पीस कमेटी की बैठक में वह दद्दा को अपनी मोटरसाइकिल पर पीछे बैठाकर जब भी कोतवाली जाते थे तो रास्ते की भीड़भाड़ देख दद्दा हमेशा यही जुमला बोलते थे ‘शहर तो लाहौर का अनारकली बाजार हो रहा है..’। अहमद खान बताते हैं दद्दा उनके पिता हाजी दिलदार खां के दोस्त थे। वह दद्दा को बाबू जी बुलाते थे।
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जमीन पर बैठकर खाना खा लेते थे दद्दा
बड़ी मस्जिद सीपरी के पेश इमाम हाफिज मो. रियाज खान बताते हैं कि वह अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं कि दद्दा बड़े सरल स्वभाव के थे। दोस्तों के साथ किसी की शादी ब्याह में जाते थे तो जमीन पर बैठकर खाना खाते थे, जब लोगों को पता लगता था कि वह ध्यानचंद हैं तो उन्हें आदर से बैठाया जाता था। वह कभी दिखावा नहीं करते थे।
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सादगी और अनुशासन प्रिय थे दद्दा
खेल जगत के लक्ष्मण पुरस्कार से सम्मानित अब्दुल अजीज बताते हैं कि दद्दा को शहर का बच्चा-बच्चा जानता है। दद्दा के परिवार से हमेशा से बड़ा जुड़ाव रहा। सादगी और अनुशासन प्रिय दद्दा के परिवार में आज भी उन्हीं के विचार दिखते हैं। द्ददा का परिवार झांसी के लिए गौरव की बात है।
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दद्दा को घूंघट से निहार रही थीं अम्मा
एनआईएस में हॉकी के कोच आफाक अहमद बताते हैं कि इस परिवार से वह बचपन से जुड़े हैं। एक बार बातचीत में अम्मा (ध्यानचंद की पत्नी) ने उन्हें बताया था कि जब ध्यानचंद ओलंपिक जीतकर लौटे थे तब वह उन्हें घूंघट से निहार रही थीं। पति की कामयाबी पर गद्गद थीं, तब पूरी गली भीड़ से भरी थी।