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शासक कितने ही जिये मरे, जिंदा झांसी की रानी हैं...

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झांसी। सेवकेंद्र त्रिपाठी ने जहां बुंदेली धरती के वीरों को लेकर खंड काव्यों की रचना की तो वहीं उन्होंने मीरा के त्याग और भक्ति को लेकर भी काव्य संग्रह की रचना की है। वीर छत्रसाल और महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता के गाथा को उन्होंने बड़े ही ओजपूर्ण तरीके से लिखा है। वह यूं तो बुंदेली के अलावा बृजभाषा के भी आचार्य थे, उन्होंने झांसी की महारानी लक्ष्मी के लिए लिखा है, क्षत-विक्षत हुआ शरीर मगर मन से शिकस्त कब मानी है। आजादी की बलिवेदी पर कर दी खुद की कुर्बानी है। हिम्मत हिमिगिर सी थी, तलवार बार था लासानी। अर्पित स्वतंत्रता -वेदी पर कुर्बां हो गई जवानी है। शासक कितने जिये मरे, जिंदा झांसी की रानी हैं। सेंवकेंद्र त्रिपाठी का जन्म झांसी के गणेश मढ़िया मोहल्ले में रामचरण त्रिपाठी के घर 19 नवंबर 1909 को हुआ था। उन्हें उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान के अलावा अन्य कई पुरस्कारों से नवाजा गया। मैथिली शरण गुप्त, वृंदावन लाल वर्मा समेत दूसरे कवियों के साथ इनकी काव्य गोष्ठियां खूब जमती थीं।
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दक्खिन शिवाजी वीर उत्तर में छत्रसाल...
आचार्य सेवंकेंद्र के भतीजे प्रेमप्रकाश त्रिपाठी शिशु बताते हैं कि सेंवकेंद्र जी का काव्य मुख्य रूप से वीर रस पर ही केंद्रति रहा है, इनमें छत्रसाल बावनी प्रमुख ग्रंथ रहा है। इसमें उन्होंने वीर छत्रसाल के द्वारा मुगलों के खिलाफ लड़े गए युद्धेों के चित्र छंद और कवित्तों के माध्यम से खींचे हैं। उन्होंने छत्रसाल बावनी में लिखा है, दोऊ वर बंड भुजदंड मारतंड तेज, दक्खिन शिवजी वीर उत्तर में छत्रसाल। शिशु ने बताया कि सेवकेंद्र जी ने छत्रसाल पंचक में भी बहुत संदर काव्य रचना की है, उन्होंने लिखा है, एरी छत्रसाल की कृपान क्रूर काटिवे में। बान बज्र शूल, चक्र हू के कान काटे है।
प्रेम प्रकाश बताते हैं कि महारानी लक्ष्मीबाई पर लिखी गई सेवकेंद्र जी की कविता वीर रस का संचार कर देती है। उन्होंने लिखा है, साहस की प्रतिमा प्रतीति वीरता की बढ़ी। चढ़ी अश्व आज सिंह वाहिनी भवानी सी। छाय गई यश कौ अखंड तेज भूतल पै, मूर्तिमति सांची बलिदान की कहानी सी। खड़्ग ले उमंग से फिरंग दल काट दीन्हैं, गंगाधर रानी कढ़ी गंगाधर रानी सी।
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पीरा भरी मीरा की अधीरा चख पूतरी में, सांवरौ सलौनों हीरा खुल खुल खेले है..
केशव जयंती समारोह समिति से जुड़े रहे कृपाराम यादव बताते हैं कि सेवकेंद्र जी ने न केवल छत्रसाल और महारानी लक्ष्मीबाई को केद्र में रखकर वीर रस की कविताओं की रचना की है बल्कि उन्होंने मीरा की कृष्ण भक्ति पर बड़ी ही सुंदर काव्य रचनाएं की हैं। उन्होंने लिखा है, पीरा भरी मीरा की अधीरा चख पूतरी में , सांवरौ सलौनों हीरा खुल खुल खेले है। सेवकेंद्र जी का न केवल बुंदेली बल्कि बृज भाषा और खड़ी बोली पर अच्छी पकड़ थी। यादव ने बताया कि 1977 में सेवकेंद्र जी को महाकवि केशव सम्मान से भी सम्मानित किया गया था।
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