दही मटकी तोड़ने के लिए ग्वाले बेहद उत्साहित हैं। उनका कहना है कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति का प्रमुख हिस्सा है। कुम्हर्रा के संजय यादव ने बताया कि पहली मटकी रामराजा सरकार ओरछा के परिसर में तोड़ने के लिए जाते हैं। यह आयोजन जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन होता है। इसके बाद सभी ग्वालों की टोलियां दही मटकी तोड़ने के लिए निकल पड़ते हैं। मटकी तोड़ने वाली टीम में 25 सदस्यों का होना आवश्यक रहता है। क्योंकि 4 घेरे बनाने पड़ते हैं।
अभ्यास लगभग दो माह पहले से शुरू हो जाता है। शुद्ध खान पान पर ज्यादा जोर दिया जाता है। उनके अनुसार दही मटकी फोड़ने के बाद जो आय होती है, वह हम लोग मंदिरों में लगाते हैं। सदर बाजार में वह वर्ष 11 से अब तक कई बार मटकी तोड़ते आ रहे हैं। सूरज सिंह ग्वाला ने बताया कि मटकी फोड़ने वाली टीम में 14 से 35 वर्ष तक के युवा शामिल होते हैं। हम लोग भगवान कृष्ण के वंशज हैं। ऐसे में पीढ़ियों से मटकी तोड़ने की परंपरा निभा रहे हैं।