गाजर घास से बनेगी जैविक खाद, बढ़ाएगी फसल की पैदावार
झांसी। जमीनों को बंजर और फसलों को बर्बाद करने वाली गाजर घास से जैविक खाद तैयार की गई है। पशुओं और लोगों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह घास का फैलाव रोकने के लिए भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने नया प्रयोग किया है। खास बात यह है कि गाजर घास से तैयार की गई खाद में पोषक तत्वों और पैदावार क्षमता गोबर खाद से दोगुनी है। इससे बुंदेलखंड के तमाम किसानों को फायदा मिल रहा है।
गाजर के पौधों की तरह दिखने वाली गाजर घास मुख्यत: खाली स्थानों, बागों, पार्कों, सड़क एवं रेल पटरियों के किनारे, खेत की मेड़ों, सिंचाई की नालियों पर पाई जाती है। इस घास का फैलाव तेजी से होता है और यह जमीन को बंजर और फसल को बर्बाद करती है। बुंदेलखंड में यह घास बहुतायत में पाई जाती है। इसका फैलाव रोकने के लिए भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने शोध किया। शोध के दौरान घास को फूल आने से पहले उखाड़कर तीन फीट चौडे़ और गहरे गड्ढे में गोबर के साथ 3:2 के अनुपात में लगाया गया।
गड्ढे में एक परत गाजर घास और एक परत गोबर की बिछाकर मिट्टी की मोटी परत से बंद कर दिया गया। इसके तीन महीने बाद गड्ढे को खोदा गया तो अच्छी खाद तैयार थी। जांच में सामने आया कि खाद में गोबर की खाद से दोेगुने पोषक तत्व थे। जिसमें 1.04 फीसदी नाइट्रोजन, 0.80 फीसदी फॉस्फोरस, 0.87 फीसदी पोटाश था। इसके साथ ही शोध में पता चला कि खाली पड़ी जमीन में फू ल आने तथा बीज बनाने से पहले ग्लाइफ ोसेट, एट्राजीन और मेट्रिब्यूज़िन नामक खरपतवारनाशी या खाने वाले नमक का प्रयोग कर घास का फैलाव खत्म किया जा सकता है। बुंदेलखंड के तमाम किसान इस तकनीक का प्रयोग कर अपनी खेती को बचा रहे हैं।
1955-56 में भारत में आई गाजर घास
संस्थान के फसल उत्पादन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनूप दीक्षित बताते हैं कि गाजर घास भारत में सबसे पहले 1955-56 में गेहूं के बीज के साथ आई थी। इसके बाद यह धीरे-धीरे करीब देश में पांच मिलियन हेक्टेयर जमीन में फैल चुकी है। यह पौधा अपने जीवन काल में करीब एक लाख बीज पैदा करता है। वैज्ञानिक डॉ. महेंद्र प्रसाद ने बताया कि देश में इसे कांग्रेस घास, सफेद टोपी, छतक चांदनी, गंधी बूटी नाम से भी जाना जाता है। गाजर घास अधिकतर फ सलों को बर्बाद कर देती है। इसके संपर्क में आने से लोगों में त्वचा संबंधी रोग, एक्जिमा रोग, दमा हो जाता है। साथ ही दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट के साथ साथ उत्पादन में कमी भी आ जाती है।
वर्जन
गाजर घास का फैलाव रोकने के लिए संस्थान की ओर से किसानों को तमाम जानकारियां दी गई हैं। साथ ही, शोध कर इससे खाद बनाई गई। जिसमें गोबर खाद से दोगुने पोषक तत्व मिले। कई किसान इसका प्रयोग कर रहे हैं। डॉ. विजय कुमार यादव, निदेशक, भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान