हाथरस : आगरा रोड पर बिकते टेसू। संवाद
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा। बचपन की यादों में शुमार टेसू-झांझी उत्सव की यह पंक्तियां अब विलुप्त होने लगी हैं। विजयादशमी से कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले बृज के इस अनूठे उत्सव से नई पीढ़ी के बच्चे अनजान हैं। टेंसू और झांझी का उत्सव बृज क्षेत्र में खासा लोकप्रिय था, लेकिन बदलते समय में मोबाइल फोन की चकाचौंध में अन्य प्राचीन परंपराओं के साथ यह परंपरा भी विलुप्त होती जा रही है।
एक दशक पहले शहर की गलियों में छोटे बच्चे टेसू और झांझी लेकर घर-घर निकलते थे। कई प्रचलित गीत गाकर चंदा मांगते थे। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए घराती दूसरा तरफ टेसू की तरफ से बराती होता था। कुछ जगह शरद पूर्णिमा पर आयोजन होते हैं। वहीं दशहरा पर रावण के पुतले के दहन के बाद टेसू लेकर घर-घर गीत गाने के साथ बच्चे नेग मांगते हैं। बालिकाओं की टोलियां झांझी का नेग मांगती थीं।
टेसू झांझी का इतिहास बहुत पुराना है। 10 साल पहले बच्चे मोहल्ले में गीत गाकर (नेग) चंदा एकत्रित करते थे। लड़के टेसू व लड़कियां झांझी लेकर चलती थीं। सभी बच्चे मिलकर गाना गाते थे। अब मोबाइल के जमाने में परंपरा विलुप्त होती जा रही है।
-ऊषा पचौरी
हर बच्चे की अलग जिम्मेदारी होती थी। हर साल टेसू का नया गीत तैयार किया जाता था। इसमें बड़ों का भी साथ होता था। वह पुराने गीतों में कुछ नया जोड़कर बच्चों को सिखाते थे। अब बदलते दौर में मोबाइल की वजह से त्योहारों की परंपरा धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं।
-अनुज शर्मा