हरदोई। सरकार की प्राथमिकताओं में शुमार मार्गों को गड्ढा मुक्त करने का अभियान कागजों में भले दमदार दिख रहा हो, लेकिन जमीन पर इसका बहुत असर नजर नहीं आ रहा। अभियान की हकीकत यह है कि शासन से 15 नवंबर तक मार्गों को गड्ढा मुक्त करने के आदेश हैं, लेकिन इसके लिए पर्याप्त बजट किसी भी कार्यदायी संस्था को मिला ही नहीं है। जो बजट मिला है, उससे भी चिह्नित मार्गों को पूरी तरह गड्ढा मुक्त नहीं किया जा सकता। अफसरों की परेशानी यह है कि वे कहें किससे। अधिकारी सिर्फ कागजी घोड़े ही दौड़ा सकते हैं।
चाहिए 11 करोड़ रुपये मिले साढ़े चार करोड़ रुपये
जनपद में लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) के तीन खंड हैं। प्रांतीय खंड, निर्माण खंड एक और निर्माण खंड-दो। तीनों खंडों में 1312 किलोमीटर, 580 मीटर लंबाई के मार्ग गड्ढा मुक्त करने के लिए चिह्नित किए गए। इन मार्गों को गड्ढा मुक्त करने के लिए विभाग को दस करोड़ 74 लाख रुपये की जरूरत है। निर्माण कार्यों को 20 सितंबर को ही मंजूरी दे दी गई थी, लेकिन अब तक चार करोड़ 53 लाख रुपये का बजट मिला है। मतलब यह कि जरूरत के सापेक्ष आधा बजट भी गड्ढा मुक्त अभियान के लिए लोक निर्माण विभाग को नहीं मिल पाया।
नगर विकास विभाग को भी नहीं मिला पर्याप्त बजट
सभी नगर निकायों को भी अपने-अपने क्षेत्रों के मार्गों को गड्ढा मुक्त करने के निर्देश दिए गए थे। इन निर्देशों के क्रम में खस्ताहाल मार्ग भी चिह्नित किए गए। छह किलोमीटर 630 मीटर लंबे मार्ग गड्ढा मुक्त करने के लिए दो करोड़ 31 लाख रुपये की जरूरत है, लेकिन इसके सापेक्ष एक करोड़ 81 लाख रुपये ही शासन स्तर से अवमुक्त किए गए।
तय समय में काम दूर की कौड़ी
मौजूदा समय में जो हालात हैं, उनमें 15 नवंबर तक सभी मार्गों को गड्ढा मुक्त करना दूर की कौड़ी है। दरअसल मंडी निर्माण निगम, गन्ना विकास विभाग, जिला पंचायत को भी अपने अपने मार्ग अभियान के तहत गड्ढा मुक्त करने हैं। बजट की आवश्यकता और इसके सापेक्ष उपलब्धता की स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि गड्ढा मुक्त अभियान की जमीनी हकीकत क्या है।
ठेकेदार भी काम करने से बच रहे
गड्ढा मुक्त अभियान के लिए बजट की उपलब्धता को लेकर विभिन्न कार्यदायी संस्थाओं के तहत निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदार भी काम करने से बच रहे हैं। अनौपचारिक बातचीत में लोक निर्माण विभाग के एक अभियंता बताते हैं कि ठेकेदारों से किसी तरह समझा-बुझाकर गड्ढा मुक्त का कार्य करा लिया जाता था और बाद में बजट मिलने पर भुगतान हो जाता था। इस बार ठेकेदार चुनावी साल होने की बात कहकर बहुत रुचि नहीं दिखा रहे हैं।