मुस्लिम बाहुल्य गढ़मुक्तेश्वर विधान सभा सीट पर तीन बार से सपा का कब्जा रहा है। राहुल अखिलेश में गांठ लगने के बाद यहां के मतदाता फिर इतिहास दोहरायेंगे या मोदी माया के फेर में उलझी इस सीट पर परिवर्तन करेंगे। इस बारे में अभी मतदाता प्रमुख प्रत्याशियों पर नजर रखते हुए मौन हैं।
हालांकि रालोद के अलावा एक निर्दलीय प्रत्याशी भी इस सीट के समीकरण बदल सकते हैं। गढ़मुक्तेश्वर विधान सभा क्षेत्र में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 3.28 लाख मतदाता हैं। 11 फरवरी को मतदान कर अपने क्षेत्र के विधायक का चुनाव करेंगे।
जिला प्रशासन मतदाताओं को अधिक से अधिक संख्या में मतदान केन्द्र पर जाकर मतदान के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके लिये तमाम इंतजाम किये गए हैं। इस क्षेत्र की राजनीति से जुड़े दिग्गजों की माने तो गढ़मुक्तेश्वर विधान सभा क्षेत्र में लगभग 85 हजार मुस्लिम मतदाता हैं।
अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 58 हजार बताई जाती है। उधर जाट-36 हजार, ठाकुर- 32हजार, त्यागी-14 हजार, ब्राह्मण -15 हजार, गुर्जर -28 हजार हैं। जबकि अन्य जातियों की संख्या 60 हजार है। हालांकि इन जातिगत आंकड़ों में थोड़ा बहुत फेरबदल भी हो सकता है।
जिले में गढ़मुक्तेश्वर सीट इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां से लगातार तीन बार सपा के मदन चौहान विधायक हैं। इस बार वह राज्यमंत्री भी हैं। पिछले चुनाव में उनका सीधा मुकाबला बसपा के फरहत हसन से था जबकि सीट भी मुस्लिम बाहुल्य है।
इसके बावजूद मदन चौहान ने 82816 वोट प्राप्त कर फरहत हसन को 18199 मतों से हराया था। हालंाकि फरहत को भी 64617 वोट मिले थे। इस जीत के लिए जहां कुछ लोगों ने मदन चौहान की कार्य प्रणाली को श्रेय दिया, वहीं कुछ ने इसे वोटों के धुर्वीकरण का परिणाम बताया था।
इस बार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राहुल गांधी से हाथ मिलाया है। इस सीट पर फिर से मदन चौहान को मैदान में उतारा है। जबकि भाजपा से कमल मलिक, बसपा से प्रशांत चौधरी, रालोद से कुंवर अय्यूब अली,निर्दलीय सतपाल यादव और अमृता कुमार भी प्रमुख रूप से चुनाव मैदान में हैं।
सतपाल यादव सपा में थे, लेकिन वह टिकट नहीं ंमिलने से नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। उनको सपा ने 6 साल के लिए निकाल दिया गया है। इन्हीं प्रत्याशियों में से मतदाताओं को अपना विधायक चुनना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्रेज, बसपा सुप्रीमो मायावती का दलित-मुस्लिम गठजोड़ का सपना और रालोद के मुखिया चौधरी अजित सिंह का किसानों के मतों पर दावा किए जाने से मतदाता उलझन में हैं। उधर निर्दलीय सतपाल यादव और अमृता कुमार भी गढ़ सीट के समीकरण बिगाड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
अमृता कुमार भाजपा के टिकट पर जिला पंचायत अध्यक्ष की आरक्षित सीट पर चुनाव एक वोट सेे हार गई थीं। वह भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य राजेंद्र कुमार की पत्नी हैं। राजेंद्र कुमार भाजपा के टिकट पर हापुड़ विधान सभा सीट पर दो बार चुनाव लड़ चुके हैं।
वह तीसरी बार भी टिकट मांग रहे थे, लेकिन नहीं मिला तो पत्नी को गढ़ से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतार दिया। हालांकि इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि अमृता कुमार सिर्फ बसपा प्रत्याशी प्रशांत चौधरपी के दलित मतों को नुकसान पहुंचाने के लिए चुनाव लड़ रही हैं।