वाराणसी में फिजी संसद की उपाध्यक्ष डॉ. वीणा भटनागर ने कहा कि मानवता सबसे बड़ा मूल्य है, जिसे हम जीते हैं और यह हमने भारत से सीखा है। आज भी फिजी में जाति और वर्ण व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। भोजपुरी लोकगीतों से हमारा आत्मीय लगाव है। यह लगाव हमें भारत से जोड़ता है।
हमने फिजी में हिंदी बचा रखी है। वो सोमवार को लंका स्थित कला दीर्घा में फिजी में हिंदी विषयक व्याख्यान को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि पांच पीढ़ी पूर्व गिरमिटिया मजदूर के रूप में हमारे पुरखे भारत से आए थे। वे अपने साथ रामायण, महाभारत, लोकगीत और भाषा व संस्कृति लेकर गए थे। विस्थापन की यात्रा में हमारे पुरखों को अपार यातना झेलनी पड़ी।
उन्होंने सबसे पहले जाति, वर्ण और धर्म के भेद को मिटाया। एक नई जाति, धर्म और नया वर्ण विकसित किया जहाजी भाई। अर्थात शुद्ध और मुकम्मल मनुष्य होना। प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक हिंदी में पढ़ाई होती है। आज भी रेडियो पर हिंदी गीतों व कार्यक्रमों का प्रसारण होता है।
अल्पनाओं का संग्रह किया भेंट
कार्यक्रम का शुभारंभ कला दीर्घा की निदेशिका मृदुला सिन्हा ने उपसभापति का स्वागत करके किया। कला दीर्घा की ओर से उन्हें सरिता लखोटिया द्वारा बनाया गया अल्पनाओं का संग्रह भेंट किया गया। गायिका सरोज वर्मा ने लोकगीतों की पुस्तक धरोहर भी भेंट की। संयोजन धीरज कुमार गुप्ता और संचालन फिजी की छात्रा शिरीन ने किया।
धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सदानंद शाही ने किया। इस अवसर पर प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. शुभा राव, प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. विद्योत्तमा मिश्र, डॉ. प्रभाकर सिंह, प्रो. राम बख्श मिश्र, डॉ. स्वस्ति मिश्र, प्रो. राकेश सिंह, कवि प्रकाश उदय, वाचस्पति, राम सुधार सिंह, दीन बंधु तिवारी आदि उपस्थित थे।