इटावा। शहर को नगर निगम बनाने की उम्मीद अभी कायम है। अपर आयुक्त कानपुर मंडल ने प्रविशिष्टियों में सुधार कर दोबारा प्रस्ताव मांगा है। अपर आयुक्त के आदेश पर जिलाधिकारी ने ईओ को सुधार कर दोबारा प्रस्ताव बनाने के निर्देश दिए हैं।
1884 में म्यूनिसिपल बोर्ड बने इटावा शहर को वर्ष 1992 मेें भाजपा सरकार ने नगर पालिका परिषद बना दिया। सदर से भाजपा विधायक सरिता भदौरिया ने शहर को नगर निगम बनने का प्रशासन शासन स्तर पर शुरू किया। उन्होंने अगस्त में सदन याचिका लगाई। इस पर शासन ने जिला प्रशासन से नगर पालिका का पूरा ब्योरा तलब किया था। ईओ अनिल कुमार ने जो रिपोर्ट शासन को भेजी थी वह जल्दबाजी में बनाई गई थी। नियमानुसार उच्चीकृत करने के लिए निकाय से जो प्रस्ताव भेजा जाता है, उसमें सभी बिंदुओं पर टिप्पणी अंकित करनी होती है। किंतु, ईओ ने मंडलायुक्त के माध्यम से जो रिपोर्ट शासन को भेजी थी उसमें ज्यादातर बिंदुओं पर टिप्पणी अंकित नहीं की गई थी। इसी कारण प्रस्ताव शासन में अटक गया। सूत्रों के अनुसार सदर विधायक ने फिर शासन में दखल दिया तो शासन ने मंडलायुक्त से दोबारा प्रस्ताव मांगा है। इस पर अपर मंडल आयुक्त ने फिर जिला प्रशासन को पत्र भेजकर इटावा शहर में उपलब्ध सुविधाओं का सर्वे कर टिप्पणी के साथ प्रस्ताव देने के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारी कार्यालय से 25 नवंबर को पत्र नगर पालिका को भेज दिया गया है। इस पर नगर पालिका दोबारा सर्वे कर रिपोर्ट बना रही है। गौरतलब है कि नगर निगम बनने के बाद विकास कार्य तेज होंगे। अभी ईओ के पास केवल 250 रुपये तक के काम स्वीकृत करने का अधिकार है, जबकि नगर आयुक्त के पास 10 लाख तक के काम स्वीकृत करने का अधिकार होता है। नगर आयुक्त का कर्मचारियों पर अधिकारियों का सीधा नियंत्रण रहता है जबकि पालिका में अध्यक्ष व बोर्ड का कर्मचारियों पर भी दखल होता है।