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रचना ने समूह बनाकर महिलाओं को दिखाई रोजगार की राह

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गांव बिरौड़ी ताजपुर में दोना-पत्तल बनाने वाली मशीन के साथ स्वर्ण जयंती स्वयं सहायता समूह की अध्य? - फोटो : BULANDSHAHR
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रचना ने समूह बनाकर महिलाओं को दिखाई रोजगार की राह
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बुलंदशहर। आज बेटियां भी हर क्षेत्र में मुकाम हासिल कर रही हैं। वह न सिर्फ खुद नई ऊंचाईयां छू रही हैं, बल्कि दूसरों की मददगार भी साबित हो रही हैं। कुछ ऐसा ही काम कर रही हैं बिरौड़ी ताजपुर गांव की रहने वाली रचना कुशवाहा। वह गांव में समूह बनाकर ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने की राह दिखा रही हैं।
रचना ने स्वर्ण जयंती स्वयं सहायता समूह बनाया और मशीन लगाकर दोना-पत्तल बनाने का काम किया, जहां पर 12 महिलाएं रोजाना करीब चार घंटे काम कर 200-200 रुपये से अधिक की कमाई कर रही हैं। रचना का कहना है कि बचपन से ही कुछ अलग करने के साथ समाजसेवा करने का सपना था, लेकिन परिस्थितियों के चलते सपना तो पूरा नहीं हो सका, लेकिन मैंने ग्रामीण महिलाओं को रोजगार दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके लिए स्वर्ण जयंती स्वयं सहायता समूह बनाया। साथ ही इस समूह से 12 महिलाओं को जोड़ा। इस समूह की मैं अध्यक्ष हूं, जबकि प्रीति सचिव और रेखा कोषाध्यक्ष हैं। समूह में रुकसार, श्वेता सिंह, ललिता सिंह, अनीता, सुशीला, रेश्मा, पपीता और मालती आदि सदस्य हैं।
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ग्रामीण आजीविका मिशन से समूह को मिली मदद
रचना ने बताया कि समूह का गठन होने के बाद पहले मैंने अपने खुद के पैसे से एक मशीन खरीदी और दोना-पत्तल का काम शुरू हुआ। जब इससे अच्छी कमाई होने लगी तो एक और मशीन सभी महिलाओं ने अपनी बचत की राशि से खरीद ली। साथ ही ग्रामीण आजीविका मिशन से समूह को 1.10 लाख की राशि मिली। इस राशि में से एक और मशीन खरीदी और शेष 50 हजार की राशि सभी महिलाओं के लिए जरूरत के अनुसार बांट दी। अब हमारे पास दोना-पत्तल बनाने के लिए तीन मशीनें हैं। सभी महिलाएं रोजाना समय निकालकर करीब चार घंटे काम करती हैं। इस तरह से एक महिला रोजाना 200 रुपये की आमदनी प्राप्त कर रही है।
आमदनी से परिवार चलाने के लिए मिलता है सहारा
संस्था की महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे दोना-पत्तल बुलंदशहर, चोला, ककोड़ और आदि स्थानों पर आसानी से बिक रहे हैं। अधिकतर रेहड़ी लगाने वाले भी घर से ही दोना-पत्तल खरीद कर ले जाते हैं। कच्चा माल भी आसानी से बुलंदशहर में ही प्राप्त हो जाता है। रचना का कहना है कि बिना किसी काम किए पैसा नहीं मिल सकता। यदि किसी भी तरह का रोजगार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। काम कोई भी किया जाए, उससे होने वाली आमदनी से परिवार चलाने के लिए सहारा मिलता है।
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अब चिप्स बनाने की है योजना
रचना ने बताया कि दोना-पत्तल से होने वाली आमदनी को देखते हुए अब समूह की महिलाएं चिप्स बनाने की योजना बना रही हैं। इसके लिए मशीन आदि खरीदने पर विचार चल रहा है। वहीं, दूसरी ओर समूह से गांव की और भी महिलाओं को जोड़ कर उन्हें रोजगार देने के लिए संपर्क किया जा रहा है।
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