बिजनौर। जनता का रुख भी अजीब होता है, कभी अनजान को ही सिरमौर बना लेती है तो कभी कद्दावर को भी तवज्जों नहीं देती। ऐसा ही साल 1993 के विधानसभा चुनाव में चांदपुर की जनता ने किया। जी हां, मिनी छपरौली कही जाने वाली इस सीट पर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की बड़ी बेटी ज्ञानवती अपनी जमानत भी नहीं बचा पाई थी। निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई थी।
साल 1993 में विधानसभा चुनाव हुए तो चौधरी अजित सिंह ने रालोद से अपनी बहन ज्ञानवती को टिकट दिया। जाट बाहुल्य क्षेत्र होने की वजह से ज्ञानवती चांदपुर से चुनाव के मैदान में उतरी थीं। निर्दलीय के तौर पर चौधरी तेजपाल सिंह ने ताल ठोंकी। चुनावी नतीजे आए तो निर्दलीय उम्मीदवार तेजपाल सिंह जीत गए थे। ज्ञानवती को हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें केवल 15777 वोट ही मिले और पांचवें नंबर पर रहीं। चौधरी चरण सिंह की दो बेटियों का विवाह बिजनौर जिले में हुआ था। बड़ी बेटी ज्ञानवती की शादी कोतवाली देहात के गांव हाजीपुर के रहने वाले सतेंद्र प्रसन्न सिंह के साथ हुई थी। सतेंद्र प्रसन्न सिंह महाराष्ट्र के डीजीपी रहे थे। दूसरी बेटी शारदा देवी का विवाह शादीपुर मिलक निवासी वासुदेव सिंह के साथ हुई थी। शारदा देवी ने कभी राजनीति की तरफ रुख नहीं किया।
चरण सिंह के मुड़कर देखते ही मंच से कूद गए थे पदाधिकारी
पूर्व विधायक सुखवीर सिंह बताते हैं कि साल 1985 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह ने अमीनुद्दीन उर्फ बादशाह को टिकट दिया। जिनका चुनाव प्रचार करने के लिए चौधरी चरण सिंह चांदपुर आए थे। रामलीला मैदान में जनसभा चल रही थी। चौधरी साहब भाषण दे रहे थे, इसी बीच मंच पर बैठे पदाधिकारी जोर जोर से बातचीत करने लगे। भाषण के दौरान शोर होने पर चौधरी चरण सिंह ने जैसे ही पीछे देखा तो सभी पदाधिकारी मंच से कूद गए। दरअसल लोग उनका काफी सम्मान करते थे।