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आधी रात तक बजते डीजे लोगों को बना रहे बीमार

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शादी-विवाह और खुशी के माहौल में डीजे बजना आम हो चुका है। इसकी कानफाड़ू आवाज आपको बीमार बना रही है। ऐसे में सतर्कता बरतने की जरूरत है। सामान्य से 10 गुना अधिक ध्वनि प्रदूषण फैलाने के कारण डीजे की आवाज कई बीमारियों को आमंत्रण दे सकती है। प्रशासनिक दिशा-निर्देश भी डीजे संचालकों पर बेअसर है। आलम यह है कि आधी रात तक कई जगह डीजे बजता रहता है। इससे लोगों की नींद भी प्रभावित होती है। दिल के रोगियों की तो धड़कन भी बढ़ जाती है।
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कालीन नगरी में चिन्हित स्थानों पर ध्वनि प्रदूषण का स्तर सामान्य से अधिक है। ट्रैफिक, दुकानों में लगे साउंड आदि के कारण ज्ञानपुर, भदोही, गोपीगंज, सुरियावां, चौरी सहित अन्य क्षेत्रों में दोपहर 12 से तीन और शाम पांच से छह बजे तक सामान्य 55 डेसिबल से अधिक करीब 85 डेंसिबल तक ध्वनि प्रदूषण का स्तर रहता है। वहीं डीजे का डेसिबल 500 से अधिक होता है। डीजे के समीप 15 से 20 मिनट और 100 डेसिबल ध्वनि के समीप डेढ़ घंटे से अधिक समय रहने पर कान की आवाज प्रभावित होने के साथ कई बीमारी भी हो सकती है। सीएचसी अधीक्षक सुरियावां डॉ. आरबी पाठक ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण का सामान्य स्तर 55 डेसिबल के आसपास माना जाता है जबकि डीजे का 500 से अधिक रहता है। ध्वनि प्रदूषण से लोगों में तनाव, तेज सिरदर्द, मांसपेशियों में जकड़न और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं बढ़ रही है। शोर-शराबे में अधिक देर तक रहने से बचना बेहद जरूरी है। उनकी मानें तो तीव्र ध्वनि की वजह से प्रजनन क्षमता घट जाती है।
खून में शर्करा बढ़ने लगती है, हृदय की धड़कन तेज हो जाती है, कार्यक्षमता घटती है और एकाग्रता नष्ट हो जाती है। युवा पीढ़ी में बौनापन, आंखों में जल्द चश्मा तथा एकाग्रता की कमी इसकी प्रमुख वजह है। अपर पुलिस अधीक्षक राजेश भारती ने बताया कि कोरोना संक्रमण काल में डीजे पर पूरी तरह रोक थी। हाईकोर्ट के आदेश के क्रम में रात 10 बजे तक डीजे बजाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए अनुमति जरूरी है। बिना अनुमति के संचालन होगा तो कार्रवाई होगी।
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