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विश्व प्रवासी पक्षी दिवसः प्रदूषण और अंधाधुंध निर्माण ने रोका विदेशी मेहमानों का रास्ता

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रामगंगा में कलरव करते पक्षी। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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दस साल में करीब तीन गुना कम हो गई बरेली आने वाले प्रवासी पक्षियों की तादाद
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भोजीपुरा, अखा गांव के तालाब, इफको, लीलौर झील, रामगंगा नदी के पास था बसेरा

बरेली। देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल बरेली से अब प्रवासी पक्षी भी दूरी बना रहे हैं। कुछ साल पहले तक रंग-बिरंगे प्रवासी पक्षियों से गुलजार रहने वाले बरेली में अब उनकी तादाद में तीन गुना तक कमी देखी जा रही है। जानकार इसे पारिस्थितिकी तंत्र पर दुष्प्रभाव के तौर पर देख रहे हैं।
वन विभाग के अनुसार साल 2010 में बरेली में प्रवासी पक्षियों की 66 और साल 2000 में 88 प्रजातियां चिह्नित की गई थीं। 2020 में हुई गणना में सिर्फ 23 प्रजाति के प्रवासी पक्षी ही चिह्नित किए जा सके। इनमें सर्वाधिक विदेशी बत्तखों की प्रजातियां बरेली पहुंची थी। दस सालों में प्रवासी पक्षियों की संख्या तीन गुना तक कम हो जाने को विशेषज्ञ अच्छा संकेत नहीं मान रहे हैं। वे पारिस्थितिकी तंत्र में इस बदलाव की वजह बढ़ते ध्वनि और वायु प्रदूषण और अंधाधुंध निर्माण कार्य को मानते हैं।
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बर्ड वाचर सचिन गौड़ के मुताबिक बरेली में रामगंगा के पास कई पोखर हैं जहां प्रवासी पक्षियों अक्सर पहुंचते हैं। अखा और भोजीपुरा गांव के तालाब पर भी बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। बिलपुर पुल के पास और मीरगंज में रामगंगा नदी किनारे भी रंग बिरंगे प्रवासी पक्षियों का बसेरा अब भी देखा जा सकता है। इफको आंवला झील में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी नवंबर से आने लगेंगे जो फरवरी तक रहेंगे।

आईवीआरआई और लाल फाटक इलाके में अब नहीं सुनाई देता पक्षियों का कलरव

जानकारों के अनुसार करीब दस साल पहले बड़ी तादाद में कैंट के लाल फाटक और आईवीआरआई के पास प्रवासी पक्षियों का बसेरा रहता था। साल 2014 के बाद यहां से इन पक्षियों की तादाद कम होने लगी थी। शुरुआत में वाहनों की बढ़ती तादाद से शोरगुल और जहरीले धुआं वजह बना। बाद में निर्माण कार्य शुरू होने पर प्रवासी पक्षियों ने यहां आना बंद कर दिया।

तेंदुओं और बाघिन में उलझे रहे अफसर

करीब दो साल तक वन विभाग की टीम बाघिन और तेंदुआ को पकड़ने में ही उलझी रही। ऐसे में अफसर विदेशी पक्षियों की निगरानी की जिम्मेदारी से बेखबर बने रहे। पिछले साल उनकी गणना भी सही तरीके से नहीं कराई गई। नवंबर में से प्रवासी पक्षियों का आना शुरू होगा, मुख्यालय ने उनकी निगरानी के निर्देश दिए हैं।

मंझा ग्राम्य वन हो सकता है गुलजार

बरेली के रेंजर वैभव चौधरी के मुताबिक मंझा ग्राम्य वन लगभग बस चुका है। रामगंगा नदी के करीब स्थित कई हेक्टेयर में फैला वन पक्षियों के अनुकूल है। उन्होंने इस बार प्रवासी पक्षियों के इस वन में प्रवास किए जाने की उम्मीद जताई है। कहा, इस वन क्षेत्र में विविध प्रजाति के पौधे लगे हैं। सैकड़ों ट्रांसलोकेट किए गए पेड़ भी हैं जिन पर पक्षियों का बसेरा होने लगा है।
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