14 सितंबर को हुई थी हत्या, भाई समेत चार पर दर्ज कराई गई थी रिपोर्ट
बरेली। अधिवक्ता संजय सिंह की हत्याकांड की विवेचना अब क्राइम ब्रांच करेगी। एसएसपी रोहित सिंह सजवाण ने इसकी जांच तेजी से पूरी करके चार्जशीट लगाने के निर्देश दिए हैं।
बिशारतगंज के गांव अतरछेड़ी में रहने वाले अधिवक्ता संजय सिंह 14 सितंबर की शाम बरेली कचहरी से घर लौट रहे थे। तभी इफको क्रॉसिंग के पास जीप से कुचलकर उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में पत्नी रजनी ने संजय सिंह के छोटे भाई मुदित प्रताप सिंह, उसके दोस्त मयंक अवस्थी, गांव के राजवीर सिंह उर्फ गुड्डू और उसके लड़के राहुल के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। मुदित बदायूं में सरेंडर करके जेल जा चुका है। राजवीर और राहुल को भी पुलिस गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है। पूर्व में इस मामले की जांच बिशारतगंज पुलिस कर रही थी। मगर एसएसपी ने इसे ट्रांसफर कर क्राइम ब्रांच भेज दिया है और जल्द चार्जशीट लगाने के निर्देश दिए हैं।
कभी हत्याओं के लिए बदनाम था इलाका, अब युवा बदल रहे तस्वीर
बरेली। रुतबा कायम रखने के लिए मामूली बात पर एक-दूसरे को मौत के घाट उतार देने के लिए बदनाम बिशारतगंज के ठाकुर बाहुल्य गांव सहासा और अतरछेड़ी की पहचान अब बदलने लगी है। यहां के युवा मिर्च की खेती करके नया इतिहास रचने में लगे हैं और गांव की तस्वीर बदल रहे हैं।
देश की आजादी के बाद से सहासा गांव में अब तक 50 से अधिक लोगों की हत्या हो चुकी है। गांव के तमाम लोग जेल में है तो कुछ आजीवन कारावास की सजा पाकर जमानत पर चल रहे हैं। गांव के माहौल को देखकर रसूखदार परिवारों ने पलायन कर लिया। उस समय सहासा गांव थाना भमोरा का हिस्सा हुआ करता था। वर्ष 1982 में बिशारतगंज थाना बनने के बाद इस गांव को भमोरा से अलग कर दिया गया। अब यह बिशारतगंज थाने का गांव है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी के बाद गांव में पहली हत्या हरपाल सिंह की हुई थी, जो रम्मू सिंह ने की थी। मगर गिरफ्तारी से पहले ही करीब डेढ़ माह बाद रम्मू की हत्या कर दी गई। उसके बाद गांव में हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। फिर बिज्जू सिंह की हत्या हुई। जुगेंद्र सिंह, प्रधान नत्थू सिंह, ऋषि पाल सिंह, देवेंद्र सिंह, धर्मवीर सिंह, संजीव सिंह, कमला, महेश सिंह सहित तमाम ऐसे नाम हैं, जिन्हें गांव की रंजिश में ही मौत के घाट उतार दिया गया। गांव में अंतिम हत्या वर्ष 2013 में मुकेश पंडित की हुई थी। मगर तब तक यह संख्या 50 के करीब पहुंच चुकी थी।
बर्बादी होते देख आगे आए युवा
खूनी संघर्ष में सहासा गांव के कई परिवार बर्बाद हो चुके थे। इसके बाद कुछ शिक्षित युवाओं ने गांव की सूरत बदलने की ठानी। उन्होंने विभागीय योजनाओं का सहारा लेकर मिर्च की खेती करनी शुरू की तो उन्हें मुनाफा होने लगा। उन्हें देखकर गांव के अन्य लोगों का भी मन बदला और वे भी मिर्च की खेती में जुट गए। परिणाम स्वरूप अब गांव की तस्वीर बदल चुकी है। अब यहां कोई भी घर कच्चा नहीं है और ज्यादातर लोग खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। इसी तरह अतरछेड़ी गांव में भी कई हत्याएं होने के बाद अब वहां का माहौल बदलने लगा है।