जानलेवा संक्रामक बीमारी कैनाइन पारवो वायरस से कुत्तों (श्वान प्रजाति) को बचाने के लिए वैक्सीन ईजाद करने में आईवीआरआई कैडरेट विभाग को बड़ी सफलता मिली है। पांच साल के शोध के बाद पुराने और नए स्ट्रेन को निष्क्रिय करने वाली वैक्सीन वैज्ञानिकों ने बनाई है। इसे पेटेंट कराने की क वायद चल रही है। जल्द ही विदेश से महंगी वैक्सीन के आयात की जरूरत नहीं रहेगी।
आईवीआरआई पशु रोग शोध एवं निदान केंद्र (कैडरेड) विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विशाल चंद्र ने 2017 में वैक्सीन के लिए शोध शुरू किया था। उन्होंने बताया कि धारणा थी कि एक बार वैक्सीन लगने के बाद कुत्तों में कैनाइन पारवोवायरस से पीड़ित होने की आशंका नहीं होती है मगर शोध के दौरान पता चला कि वैक्सीनेशन के बावजूद कुत्ते इस जानलेवा वायरस की चपेट में आ रहे हैं।
पता लगा कि ऐसा वायरस के स्वरूप बदलने यानी नए स्ट्रेन में परिवर्तित होने से हो रहा है। इसके बाद शोध का लक्ष्य पुराने और नए दोनों स्ट्रेन को निष्क्रिय करने वाली वैक्सीन ईजाद करने का तय किया। शुरुआत संक्रमित कुत्तों से वायरस लेकर आइसोलेशन से हुई। सेल कल्चर आधारित वैक्सीन बनाने की कवायद पूरी की गई।
वैक्सीन बनने का प्रभाव आंकने के लिए कुत्तों पर टेस्ट करना जरूरी था। लिहाजा कमेटी फॉर द परपज ऑफ कंट्रोल एंड सुपरविजन ऑफ एक्सपेरिमेंट ऑन एनिमल (सीपीसीएसईए) से अनुमति ली गई। पिछले साल तीन बार ट्रायल किया गया जो सफल रहा। वैक्सीन पेटेंट कराने के लिए भेज दी गई है। पेटेंट के बाद इसे रिलीज किया जाएगा।
क्या है और कैसे फैलता है पारवोवायरस
पारवो वायरस सर्वाधिक संक्रामक रोग है जो आवारा और पालतू दोनों कुत्तों में फैलता है। आमतौर पर यह पार्क, सड़क किनारे, घर के आसपास अगर कोई संक्रमित कुत्ता मल त्यागे तो उसके सूंघने से यह दूसरे कुत्तों को संक्रमित करता है। वैक्सीन ही इसका इलाज है।
अगर एक बार कोई कुत्ता संक्रमित हुआ तो सही इलाज न मिलने पर उसकी मौत तय होती है। संक्रमित होने पर कुत्ता बेहद सुस्त हो जाता है। कुछ भी खाने पर उल्टी, तेज बुखार, खून के साथ दस्त होते हैं। भूख कम लगती है और वजन तेजी से घटता है। रक्त और प्रोटीन का आंतरिक रिसाव मौत की वजह बनता है।
बचाव के लिए टीकाकरण बेहद जरूरी
डॉ. विशाल चंद्र के मुताबिक पालतू कुत्ते को पारवो संक्रमण से बचाने के लिए पिल्ले और कुत्तों का वैक्सीनेशन जरूरी है। एक बार संक्रमित होने पर इलाज के बाद वयस्क कुत्तों में बचाव की उम्मीद महज 80 फीसदी होती है।
घर में साफ सफाई और प्रयास हो कि पालतू कुत्ता, पिल्ले आवारा या संक्रमित कुत्ते के संपर्क में न आ सके। बता दें कि पिल्लों के संक्रमित होने के बाद उनके बचाव की उम्मीद बेहद कम रहती है। क्योंकि रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से वायरस तेजी से शरीर के अंगों को प्रभावित करता है। श्वेत रक्त कणिकाएं तेजी से कम हो जाती हैं।