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भारत की मूल आत्मा से जुड़े रहे मुस्लिम कवि, कभी श्याम को पूजा तो कभी गंगा की आराधना की

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- मुस्लिम कवियों में राष्ट्रीय चेतना: रहीम, रसखान एवं नजीर अकबराबादी के संदर्भ में राष्ट्रीय संगोष्ठी
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- हिंदी साहित्य से जुड़े कई विद्वानों ने मुस्लिम कवियों की राष्ट्रीय चेतना विषय पर दिया व्याख्यान
बरेली। ‘मुस्लिम कवियों में राष्ट्रीय चेतना: रहीम, रसखान एवं नजीर अकबराबादी’ विषय पर रुहेलखंड विश्वविद्यालय में शनिवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। वक्ताओं ने अकबर के समकालीन रहीम और रसखान को भारत की मूल आत्मा का प्रतिनिधि बताया। कहा, नजीर अकबराबादी की कविता में भी देश की मूल आत्मा की झलक और आम आदमी की पीड़ा देखने को मिलती है। इन कवियों ने इस्लाम का पालन करते हुए कृष्ण की भक्ति, हिंदुत्व के सिद्घांतों और लक्ष्मी-गंगा जैसी देवियों की आराधना कर सच्चे राष्ट्रवाद को परिभाषित किया। मौजूदा परिवेश में इस भावना का अभाव है, तभी दूरियां बढ़ गई हैं। सिर्फ साहित्य ही इस खाई को पाट सकता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ साहू रामस्वरूप महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती वंदना और स्वागत गान से किया। विशिष्ट अतिथि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. नजीर ने ‘रहीम के बरबै’ पर प्रकाश डालते हुए मुस्लिम कवियों में राष्ट्रीयता के भाव की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मुगलकाल में भारतीय दर्शन स्वतंत्र था। एकात्म और आत्मसात करने वाला था। तभी तो मुस्लिम कवि भी हिंदू देवी देवताओं खासकर कृष्ण भक्ति में डूबे रहे। मुख्य वक्ता हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयागराज के प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने रहीम के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें कवि, सेनापति, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद और कलाप्रेमी बताया। कहा कि वह मुगल राजपरिवार से थे और अकबर के लिए कई जंग जीतीं। जन्म से मुसलमान होते हुए भी उन्होंने हिंदी जीवन, हिंदू देवी देवता, पर्वों, धार्मिंक मान्यताओं और परंपराओं का अपनी कविता के माध्यम से उल्लेख किया। रसखान ने भी कृष्ण भक्ति काव्य को मुगलकाल में एक ऊंचा मुकाम दिलाया। नजीर अकबराबादी को उन्होंने एक प्रयोग करने वाला कवि बताया। बीएचयू से आए प्रो. वशिष्ठ ‘अनूप’ ने कहा चाहे कबीर हाें, रहीम हों या रसखान। इन सभी ने भारतीयता की मूल भावना से जुड़कर समाज को एक नई दिशा दी है। हिंदी संस्थान की उप संपादक डॉ. अमिता दुबे ने भी व्याख्यान दिया। स्वागत भाषण प्रो. नलिनी श्रीवास्तव और अतिथि परिचय डॉ. क्षमा पांडेय ने दिया।
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‘रहीम, रसखान को पढ़ें आजादी के नारे लगाने वाले छात्र’
कुलपति प्रो. अनिल शुक्ल ने रहीम, रसखान और नजीर जैसे कवियों की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता पर व्याख्यान दिया। कहा आजकल देश के कई विश्वविद्यालयों में आजादी के नारे लगाने वाले छात्र-छात्राएं इन कवियों की रचनाओं को पढ़ें और इनमें छुपा राष्ट्रीय चिंतन व राष्ट्रवाद को पहचानें। तभी देश को आगे बढ़ाया जा सकता है। कहा, इस देश की मूल आत्मा में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही एक दूसरे की रीति व परंपराओं को आत्मसात कर उनका सम्मान व सरंक्षण करते हैं। यही इन कवियों ने भी किया।


भारतीय भाषाओं के ग्रंथ और काव्यों का अनुवाद तेज करने की जरूरत
बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहुंचे हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा, भारत में राष्ट्रवाद सच्चे अर्थों मेें तभी सामने आ सकेगा जब सभी भारतीय भाषा और उन्हें बोलने वालों को एक सूत्र में पिरोया जाएगा। इसके लिए एक दूसरे की संस्कृतियों को साथ लाना जरूरी है, जिसके लिए एक दूसरे के साहित्य का अनुवाद कर इन संस्कृतियों को आत्मसात करना होगा। इसके लिए भारत के विभिन्न संस्थान और सरकार भी प्रयासरत है।
प्रो. दीक्षित ने बताया कि दक्षिण के कवियों और उनकी रचनाओं को उत्तर भारत में कोई नहीं जानता। इसी तरह उत्तर के कवियों को दक्षिण के लोग पढ़ना नहीं पसंद करते। ऐसे में दोनों संस्कृतियों में तालमेल बैठाने के लिए साहित्य जगत अब इसकी आवश्यकता महसूस कर रहा ह। इसमें दक्षिण के कवियों और रचनाकारों द्वारा लिखित धार्मिक ग्रंथ और दर्शन को हिंदी में अनुवादित किया जाए। साथ ही हिंदी की रचनाओं के भी दक्षिण की भाषाओं में अनुवाद करने की प्रक्रिया में भी तेजी लाई जाए। इसके लिए बड़ी संख्या में दुभाषिए अनुवादकों की जरूरत होगी जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं। बताया कि हिंदी साहित्य सम्मेलन भी इस बात पर जोर दे रहा है।
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हिंदी के विकास पर उन्होंने कहा कि नागरी प्रचारिणी और हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी संस्थाओं के सहयोग से पिछले वर्षों में हिंदी में आठ लाख शब्दों का एक शब्दकोष बनाया गया। इसमें आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले हिंदी, अंग्रेेेजी, अरबी और फारसी के शब्दों के अलावा देशज और अपभ्रंश शब्दों को समाहित किया गया है। यूरेस्को ने इस शब्दकोष को दुनिया का सबसे बड़ा और समृद्घ शब्दकोष करार दिया है। कहा कि संचार माध्यमों ने हिंदी को तेजी से प्रसिद्घि दिलाई है। हालांकि उन्होंने हिंदी में नई और मौलिक रचनाएं लिखने पर जोर देते हुए इसे हिंदी के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण करार दिया।
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