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कतर्नियाघाट में जंगल सफारी के साथ ही अब सांस्कृतिक टूरिज्म भी

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15 बीएचआर 28 - कतर्नियाघाट संरक्षिन वनक्षेत्र में पर्यटन सत्र के उद्घाटन के दौरान नृत्य करतीं थारू ? - फोटो : BAHRAICH
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बहराइच। कतर्नियाघाट जाने वाले पर्यटकों को जल्दी ही जंगल सफारी के साथ ही सांस्कृतिक टूरिज्म का मजा भी मिलेगा। यहां आने वाले पर्यटक जंगली जीवों को नजदीक से देखने के साथ ही जंगल में रहने वाली थारू जनजाति की जीवन शैली, खानपान व संस्कृति की झलक भी सांस्कृतिक टूरिज्म के तहत पा सकेंगे। वन विभाग की तरफ से शुरू हुई इस कवायद के तहत पूरे इलाके में पर्यटन की सुविधाएं भी बढ़ेगी। पर्यटकों को मनोरंजन के साथ ही जंगल में रहने वाली थारू जनजाति की जीवन शैली व खान पान को भी करीब से देखने का मौका मिलेगा। इससे कतर्नियाघाट को देश भर में एक बड़े पर्यटन केंद्र के बतौर पहचान दिलाने में भी मदद मिलेगी।
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वर्तमान सीजन में पर्यटकों के लिए खुले कतर्नियाघाट में वन विभाग द्वारा कई बदलाव लागू किए हैं। इसके तहत इस बार वन विभाग पर्यटकों को न सिर्फ जीव जंतुओं की सैर कराएगा वरन वन में रह कर परंपरागत जीवन शैली जीने वाले थारू समाज की परंपरा, उनकी लोक संस्कृति, नृत्य व खानपान से भी पर्यटकों को रूबरू कराएगा। वन क्षेत्र में थारू जनजाति से जुड़े करीब 14 गांव हैं, जिसमें थारू समाज के 40 हजार लोग रहते हैं।
ज्यादातर थारू कच्चे मिट्टी के मकानों में रहते हैं और उनकी जीवन शैली प्रचीन काल जैसी है। उनका भोजन और उसको तैयार करने का तरीका और लोक नृत्य भी खासा चर्चित है। थारू समाज के लोग सिर्फ मछली से बनने वाले 12 प्रकार के व्यंजन तैयार करते हैं। उनका परंपरागत शाकाहारी भोजन भी बहुत स्वादिष्ट व पोष्टिक होता है। इसी लिए कतर्नियाघाट आने वाले पर्यटकों के लिए विशेषतौर पर थारू थाल की व्यवस्था कराने की भी योजना है।
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वन प्रभागीय अधिकारी आकाश बधावन ने बताया कि एक निर्धारित राशि पर थारू थाल पर्यटकों को परोसी जाएगी। थारू जाति को जोड़ने से होने वाली आर्थिक धनराशि का पूरा हिस्सा जनजाति के उत्थान व विकास कार्य पर ही खर्च होगा। इससे थारूओं का आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा।
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