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स्वराज भवन: अंग्रजों की बनवाई इमारत में लिखी गई उन्हीं की विदाई की इबारत

Sun, 08 Aug 2021 12:09 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

  • 22 एकड़ भूमि पर नवंबर 1871 में 18,684 रुपये की लागत से हुआ तैयार
  • 24 नवंबर 1931 को जवाहर लाल नेहरू ने न्यास बनाकर कर दिया समर्पित
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prayagraj news : स्वराज भवन। - फोटो : prayagraj
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विस्तार
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यह एक अजब संयोग है कि अंग्रेजों ने जिस भवन को भारत में अपना शासन सुदृढ़ करने के उद्देश्य से बनवाया था, उसी ने अंग्रेजों को इस देश से निकालने में महती भूमिका निभाई। मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने स्वराज भवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन का सबक सीखा।

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भारत को स्वराज्य दिलाने में स्वराज भवन का अतुलनीय योगदान रहा। यह भवन तकरीबन साढ़े तीन दशकों तक स्वाधीनता आंदोलन को दिशा देने वाला प्रमुख केंद्र रहा। वर्ष 1946 तक यह अखिल भारतीय कांग्रेस का मुख्यालय भी रहा। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान यहां कई ऐतिहासिक बैठकें हुईं और महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। कई फैसले तो ऐसे रहे जिसने देश की आजादी की लड़ाई की पूरी दिशा ही बदल दी। वर्ष 1916 में इसी भवन में हुई कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संयुक्त बैठक के बाद नरम और गरम दलों के बीच सेतु बना। यहीं पर वर्ष 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का महत्वपूर्ण निर्णय लिया था।

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prayagraj news : स्वराज भवन। - फोटो : prayagraj
दरअसल 1871 में इस कोठी को बनाने के लिए सर जान स्ट्रेची ने लार्ड मेयो से अनुमति लेकर लगभग 22 एकड़ भूमि आवंटित कराई और उसी वर्ष नवंबर में 18,684 रुपये की लागत से यह बनकर तैयार हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष और कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो.हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं, वायसराय की कौंसिल के मेंबर सर सैयद अहमद खां के बेटे और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले भारतीय न्यायाधीश सैयद महमूद के नाम पर इस कोठी का नाम ‘महमूद मंजिल’ रखा गया। बाद में 1892 में जब सैयद महमूद न्यायाधीश पद से त्यागपत्र देकर निजाम हैदराबाद की सेवा में चले गए तो मुरादाबाद के राय बहादुर और जिला जज राजा परमानंद पाठक ने इस भवन को खरीद लिया। फिर इसका नाम ‘पाठक निवास’ हो गया।

लेकिन, पाठक जी को यह बड़ी कोठी खर्चीली लगने लगी तो उन्होंने 1899 में इसे मोतीलाल नेहरू के हाथ बेच दिया, जिन्होंने इसका नाम ‘आनंद भवन’ रखा। इस बीच वर्ष 1926 में मोतीलाल ने जवाहर लाल को कहीं यह कहते सुन लिया था कि जब वह आनंद भवन के मालिक होंगे तो उसे राष्ट्र को समर्पित कर देंगे। तभी उन्होंने सोच लिया कि जब जवाहर की यही इच्छा है तो फिर इंतजार क्यों और उन्होंने इस भवन को राष्ट्र को समर्पित करने का संकल्प लेते हुए 6 अप्रैल 1930 को मूर्त रूप दे दिया, जब देश गांधी जी के नमक आंदोलन का साक्षी बना तो यह भवन आनंद भवन से स्वराज भवन बन गया। लेकिन, फरवरी 1931 में ही मोतीलाल नेहरू नहीं रहे। ऐसे में 24 नवंबर 1931 को जवाहर लाल नेहरू ने दानपत्र हस्ताक्षरित करके स्वराज भवन को न्यास बनाकर समर्पित कर दिया।

कभी तैनात रही फौजी टुकड़ी
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में स्वराज भवन भी प्रभावित हुआ। यहां की जाने कितनी महत्वपूर्ण वस्तुएं नष्ट कर दी गईं। यहां पहरे के लिए फौजी टुकड़ी तैनात की गई थी।
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