इलाहाबाद। नेहा भले ही आम लोगों की तरह चल फिर नहीं सकती लेकिन अपने बुलंद हौसलों की बदौलत उसने ऐसा मुकाम हासिल किया है जो किसी सामान्य युवा के लिए भी मुश्किल हो सकते हैं। जन्म के छह महीने बाद से ही ‘स्पाइनल मस्कुलर डॉसट्रोफी’ का शिकार होने पर वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। इसके बावजूद नेहा और उसके अभिभावकों ने हार नहीं मानी। पढ़ाई में बेहद होशियार नेहा को 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से ‘इनोवेटिव साइंस’ के लिए ‘बालश्री सम्मान’ प्राप्त हुआ। वर्ष 2009 में हाईस्कूल में अपने टैगोर पब्लिक स्कूल में टॉप करने सहित नेहा ने वर्ष 2011 में सीबीएसई की ऑल इंडिया स्पेशल कैटेगरी में सेकेंड रैंक हासिल किया।
नेहा की सफलता का रास्ता सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि 2013 में उसकी शैक्षिक उपलब्धियों को देखते हुए उसे प्रदेश सरकार से ‘रोल मॉडल’ का सम्मान प्राप्त हुआ। उसकी परवरिश अच्छी तरह से हो सके, इसलिए आईटीआई में कार्यरत पिता त्रिलोकीनाथ मेहरोत्रा ने वीआरएस ले लिया। पीएचडी होने के बावजूद मां डॉ.क्षमा मेहरोत्रा ने नौकरी से नाता तोड़ लिया। नेहा के माता पिता को नेहा पर गर्व है। बेटी ने उन्हें समाज में सम्मान दिलाया।
एसएस खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज से प्रथम श्रेणी में बीए करने के बाद आईएस की तैयारी में जुटी नेहा भी अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देती है। बकौल नेहा, हर बेटी को अपनी काबिलियत पर भरोसा होना चाहिए क्योंकि इसके बिना सफलता मुमकिन नहीं।