मुगलकालीन शब्द है पेशवाई
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने इन शब्दों को बदले जाने की बात कही है। कहा कि शाही और पेशवाई मुगलकालीन शब्द है। कहा कि निरंजनी अखाड़ा अपने यहां आने वाले संतों को पत्र लिखकर निर्देश दे रहा है कि महाकुंभ में शाही की जगह राजसी एवं पेशवाई की जगह छावनी प्रवेश जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाए। कहा कि इस माह प्रयागराज में भी अखाड़ा परिषद की बैठक होनी है। बैठक में शाही और पेशवाई शब्द बदलने के लिए प्रस्ताव पास किया जाएगा। कहा कि परिषद की बैठक में संस्कृत और हिंदी के और भी अच्छे शब्द आते हैं तो उसे स्वीकार किया जाएगा। परिषद की ओर से इस संबंध में मेला प्राधिकरण को भी पत्र भेजा जाएगा।
अखाड़ा परिषद भी करेगा जल्द शब्दों में संशोधन: श्रीमंहत
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि सनातन पर मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव की पहल सर्वमान्य है। अखाड़ा परिषद भी कुंभ स्नानों में किए जाने वाले शब्दों में जल्द परिवर्तन करेगा। क्योंकि, संस्कृत और हिंदी में शब्दों की कोई कमी नहीं है।
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने महाकाल के नाम पर निकलने वाली शोभायात्रा को परिवर्तित करने का निर्णय लिया है। निश्चित तौर पर सनातन संस्कृति और इस सभ्यता के अनुरूप है। शाही, पेशवाई ऐसे शब्दों का न प्रयोग करते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की यह पहल हाेगी कि इस कुंभ में सनातन संस्कृति के अनुरूप नाम रखा जाएगा। यहां पर कोई शहंशाह नहीं है। न तो संस्कृति और हिंदी में शब्दों में कमी है।
निरंजनी अखाड़े के श्रीमहंत अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमंहत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का लिया गया निर्णय सर्वमान्य है। ऐसे लोक प्रिय नेता का अनुशरण सभी को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रयागराज कुंभ के पहले अखाड़ों की बैठक बुलाई जाएगी। इसमें निर्णय लिया जाएगा कि शाही नहीं राजसी या अन्यंत्र नाम जो भी अखाड़ों से आएगा, उसको मान्यता दी जाएगी।
श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि मैकाले की शिक्षा पद्धति अगर बदली जा सकती है। सनातन संस्कृति को बचाने के लिए एक मुख्यमंत्री पहल करता है, इससे सभी संतों को प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऊर्दू, फारसी के शब्दों की आवश्यकता फिलहाल हमें नहीं है। हमारे पास संस्कृत और हिंदी के इतने शब्द हैं कि जिससे हम अपने कार्यक्रम, अपने आयोजन और परंपरा का निर्वहन कर सकते हैं।