प्रदेश सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि सरकार को एनसीटीई द्वारा तय योग्यता से उच्च योग्यता निर्धारित करने का अधिकार है। इसमें कोई अवैधानिकता नहीं है। यह भी कहा गया कि यह सरकार का नीतिगत निर्णय है जिसका न्यायिक पुनरावलोकन संभव नहीं है। क्योंकि न्यायिक पुनरावलोकन तभी हो सकता है जब आदेश असांविधानिक हो।
कोर्ट ने कहा कि इस बात में कोई विवाद नहीं है कि प्राइवेट संस्थानों में इसी पाठ्यक्रम की अर्हता इंटरमीडिएट है। राज्य सरकार द्वारा डीएलएड और डीएलएड स्पेशल कोर्स के लिए अलग-अलग योग्यता तय करना वर्ग के भीतर वर्ग पैदा करना है। जबकि दोनों पाठ्यक्रमों में कोई तात्विक फर्क नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सामान्य स्थिति में अभ्यर्थी 3 वर्ष में सहायक अध्यापक होने की अर्हता प्राप्त कर लेगा। जबकि, नई व्यवस्था से उसे 5 वर्ष लगेंगे। यह मनमाना, भेदभावपूर्ण निर्णय है और संविधान के अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार के विपरीत है। कोर्ट ने नौ सितंबर के शासनादेश के उस अंश को रद्द करते हुए याचियों को प्रवेश प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश दिया है।