तकरीबन आठ साल पहले मिलेनियम स्टॉर अमिताभ बच्चन की आई फिल्म पॉ तो आप सभी को याद ही होंगी। इस फिल्म में अमिताभ ने एक ऐसे बच्चे का किरदार निभाया था जो बेहद की कम उम्र में बूढ़ों जैसा नजर आता है। सिर पूरी तरह गंजा, चेहरे पर बुढ़ों जैसी झुर्रियां और हाथ व व पैर की चमड़ियां भी पूरी तरह सिकुड़ी हुईं। असल में अमिताभ के किरदार के उस करेक्टर वाले बच्चे को प्रोजेरिया जैसी जानलेवा बीमारी रहती है। इस फिल्म में बीमारी से ग्रसित बच्चे को पा का नाम दिया गया था। इस बीमारी का शिकार बच्चा किशोरावस्था में ही बुढ़ों जैसा नजर आता है। शहर से तकरीबन बीस किलोमीटर दूर बहादुरपुर विकास खंड के धनईचा गांव में भी चार साल पहले ऐसा ही एक किशोर पाया गया था जो अब युवा बन चुका था।
25 साल की उम्र में वह बूढ़ों जैसा दिखाई देता था। गांव वाले दुलार से उसे पा के नाम से ही बुलाते थे। बहादुरपुर विकास खंड के धनईचा गांव निवासी रमपत भारतीया ट्राली चालक है। उसकी कमाई से ही पत्नी और पांच बच्चों के परिवार का भरण-पोषण होता है। उसकी सबसे बड़ी औलाद 25 साल का रुपेश था। इसके अलावां उसे अनिल, सुनील, वकील और मुनीम नाम के बेटे हैं। रुपेश को पैदा होने के कुछ माह बाद ही प्रोजेरिया जैसी गंभीर बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। गरीबी से घिरा ट्राली चालक और उसकी पत्नी गुड्डी देवी देहात से लेकर शहर तक के चिकित्सकों के यहां उपचार को दौड़े लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। चिकित्सकों के मुताबिक प्रोजेरिया एक जेनेटिक बीमारी है।
लैमिन ए जीन में गड़बड़ी होने के कारण यह बीमारी होती है। चिकित्सकों के मुताबिक यह बीमारी कई लाख लोगों में किसी एक को हो जाती है। जानकारों के अनुसार पूरे विश्व में अब तक केवल 62 लोगों में यह बीमारी पाई गई है। इस बीमारी में सिर के पूरे बाल झड़ जाते हैं। दांत निकलने से पहले ही गिरने लगते हैं। इस बीमारी से ग्रसित बच्चों की उम्र भी 18 से बीस साल ही होती है। अब तक सबसे ज्याद जीने का रिकार्ड विदेश के एक प्रोजेरिया मरीज के नाम रहा है। उसकी मौत 26 साल में हुई थी। हनुमानगंज का रुपेश विदेशी मरीज के रिकार्ड तोड़ने के महज एक साल पीछे रह गया था। तकरीबन चार साल पहले अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने पर रुपेश का उपचार कराने के साथ अन्य सरकारी सहायता प्रदान की गई थी। बुधवार को उसके देहांत से परिजन भी गमजदा थे।
झूंसी। झूंसी के लीलापुर रोड के देवनगर कालोनी के रहने वाले वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. गिरीश पांडेय ने प्रोजेरिया मरीज की तलाश तकरीबन चार साल पहले की थी। तब से डॉ. पांडेय बच्चे को हर संभव सरकारी और विभिन्न संस्थाओं से मदद दिलाने को कवायद कर रहे थे। उनके अथक प्रयास से ही रुपेश को मेडिकल सहायता प्रदान की गई थी। हालांकि इस बीमारी का अब तक कोई उपचार सामने नहीं आ सका है। डॉ. पांडेय ने बताया कि बच्चे की दीमागी हालत बिल्कुल ठीक थी। वह मां-बाप के अलावां अपने सभी भाईयों और ग्रामीणों को भी भलि-भांति पहचानता था। बातचीत भी कर लेता था। इसके बावजूद वह पूरी तरह दूसरों पर ही आश्रित था।