इस दौरान उनके बगल में मौजूद परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि ने उनका हाथ पकड़कर बैठा दिया और संयम बरतने की सलाह दी। इसके बाद जब सीएम का संबोधन पूरा हुआ और वह सभागार से बाहर निकलने लगे, उसी समय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी महंत राजेंद्र दास और उनके गुट के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी (महानिर्वाणी) के पास पहुंच गए।
उनका कहना था कि किसने कितनी धनराशि महंत नरेंद्र गिरि और महंत ज्ञानदास को दी है, हिम्मत हो तो बताओ। वह धनराशि पाई-पाई चुकता कर दी जाएगी। परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि सीएम की बैठक में प्रदेश भर के अफसरों की मौजूदगी में अखाड़े के शीर्ष और ब्रह्मलीन पदाधिकारियों पर इस तरह के मनगढ़ंत आरोप लगाकर संत समाज की छवि धूमिल करने वालों को सबक सिखाया जाएगा।
इस दौरान महंत यमुनापुरी और अन्य संत भी शोर-शराबे का हिस्सा बने रहे। अंत में महंत हरि गिरि और महंत प्रेम गिरि ने समझा बुझाकर किसी तरह दोनों गुटों के संतों को शांत कराया। हालांकि, बैठक के दौरान इस तरह की तल्खी और आरोप-प्रत्यारोप को लेकर सीएम ने भी बाद में नसीहत दी। उनका कहना था कि संतों को सोच समझ कर बोलना चाहिए, ताकि सनातन की गरिमा बनी रहे।