इलाहाबाद संग्रहालय में रख रखाव के अभाव में नष्ट हो रहे दुर्लभ अभिलेख।
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मिट्टी में तब्दील हो रहे अभिलेख
इन हस्तलेखों की अनदेखी किस हद तक की गई इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिन बस्तों में ताड़पत्र और पांडुलिपियां रखी गई थीं, उसके कई हिस्से मिट्टी में तब्दील हो गए हैं। नियमानुसार बिना विक्रय कमेटी के गठन के किसी ऐसे दस्तावेज या बहुमूल्य संपदा का हस्तांतरण नहीं कराया जा सकता। ऐसे में इन पांडुलिपियों के लिए कब और किसके नेतृत्व में कमेटी बनाई गई थी, इस पर भी संग्रहालय प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं है।
पुस्तकालय में रखी पांडुलपियां भी नहीं रखी गईं स्ट्रांग रूम में
इसके अलावा बड़ी संख्या में पांडुलिपियों संरक्षित न कर पुस्तकालय में रखी हुई हैं। वर्षों पहले पुस्तकालय में रखी पांडुलिपियों को निकालकर संरक्षित किए जाने के आदेश किए थे, लेकिन उसे भी नजर अंदाज कर दिया गया।
संग्रहालय प्रशासन ने दी सफाई, संग्रह के योग्य नहीं थे ताड़पत्र और हस्तलेख
प्रयागराज। इलाहाबाद संग्रहालय प्रशासन की ओर से शुक्रवार को पांडुलिपियों और ताड़पत्रों के नष्ट होने पर सफाई दी गई। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2004 में यह पांडुलिपियां और ताड़पत्र लाए गए थे। उस समय कंजर्वेशन लैब की रिपोर्ट मंगाई गई तब पता चला कि वह पांडुलिपियां संग्रह के योग्य नहीं हैं। ऐसे में उन्हें पंजीकृत नहीं किया गया और उनके संरक्षण की जरूरत नहीं समझी गई। उधर, छह सदस्यीय जांच कमेटी की रिपोर्ट में रसायन सहायक और कंजर्वेशन अधिकारी श्वेता सिंह ने अपनी टिप्पणी भी दी है।
श्वेता ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जहां पांडुलिपियां और ताड़पत्र रखे गए थे, वह रिजर्व कमरा नहीं, बल्कि चैंबर है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा है कि वहां ताड़पत्रों में दीमक का उपचार पूर्व में सहायक रसायनज्ञ की ओर से किया जा चुका है। अब सवाल उठता है कि जब वह ताड़पत्र संग्रह में नहीं थे और उन्हें खुले हाल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया था, तब उनका दीमकों से उपचार क्यों कराया जाता रहा। फिलहाल ऐसे सवालों पर संग्रहालय प्रशासन मौन है।