याची अधिवक्ता का कहना था कि मदरसों में पढ़ रहे मुस्लिम बच्चे केवल उर्दू, अरबी, फारसी की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। कहा गया था कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए एक ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो अन्य कॉलेजों में दी जा रही है। याची का कहना था जब तक मदरसों में तकनीकी व वैज्ञानिक शिक्षा नहीं दी जाएगी. तब तक बच्चों को मदरसों की पढ़ाई से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
प्रदेश के अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कोर्ट को बताया कि मदरसों में दी जा रही मुंशी, मौलवी व आलिम की शिक्षा यूपी बोर्ड के जूनियर हाईस्कूल हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के बराबर है। सरकार की तरफ से मदरसों में दी जा रही शिक्षा व इससे जुड़े कानूनी पहलू पर भी कोर्ट का ध्यान आकृष्ट किया गया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जनहित याचिका को गैर पोषणीय मानते हुए खारिज कर दिया।