अनुपम परिहार बताते हैं कि जब सरस्वती के किसी अंक के लिए सामग्री का अभाव होता था, तब आचार्य अपने ही दूसरे काल्पनिक नामों से रचनाएं लिखकर प्रकाशित करते थे। अब तक ऐसे उनके 14 नामों का उल्लेख मिल चुका है। परिहार के मुताबिक जुलाई 1908 के अंक में कवियों में उर्मिला विषयक उदासीनता शीर्षक के आलेख भुजंग भूषण भट्टाचार्य के नाम से प्रकाशित हुआ था।
भुजंगभूषण कोई और नहीं, आचार्य महावीर प्रसाद ही थे। इसके अलावा वह कवि किंकर, सुकवि किंकर, कुंज, कमल किशोर त्रिपाठी, श्रीकंठ पाठक एमए, चक्रपाणि शर्मा, निपुण नारायण शर्मा, पुराणपाठी, परमेश्वर शर्मा, द्विरेफ, कल्लू अल्हइत, विपन्न और एक ग्रामीण नाम से भी उनके आलेख सरस्वती में प्रकाशित हुए थे।