श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब रास करने की अभिलाषा से श्रीकृष्ण ने वेणु वादन आरंभ किया तो उसके स्वर को सुन भोलेनाथ भी प्रभु के रास दर्शन की अभिलाषा में वृंदावन आ पहुंचे।
सखियों ने उन्हें रोकते हुए कहा यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। रास में प्रवेश का अधिकार केवल गोपियों को हैं। यह सुनकर भोलेनाथ ने तत्काल गोपी वेश धारण किया और बन गए गोपेश्वर महादेव।
पौराणिक मान्यता है कि श्रीकृष्ण की इस पावन लीला के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ ने इन्हें खोजकर वंशीवट के समीप स्थापित किया। तभी से गोपेश्वर महादेव यहां भक्तों को दर्शन लाभ दे रहे हैं।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि चाचा हितवृंदावनदास ने इसका उल्लेख अपने पद नाम विदित गोपेश्वर जिनकौ, ते वृंदा कानन कुतवार में भी किया है।
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