मुगलिया रिवरफ्रंट गार्डन का हिस्सा जोहरा बाग और रामबाग के बीच में आवागमन के लिए गेटवे ऑफ रामबाग बना हुआ था। दोनों मुगलकालीन बागीचों की दीवारों के बीच प्रवेश द्वार था, जिसके बड़े हिस्से को वर्ष 1968-69 में ध्वस्त कर दिया गया। इसे नाम बेशक गेटवे ऑफ रामबाग दिया गया है लेकिन जोहरा बाग की उत्तरी दीवार का यह हिस्सा है। रामबाग की हाईवे किनारे की दीवार के सहारे बने रास्ते से पुल के नीचे तक पहुंचा जा सकता है। एएसआई के अधिकारियों ने ध्वस्तीकरण के बाद फिर इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया था।
ये भी पढ़ें - UP: धर्मस्थलों पर 21 करोड़ की धनवर्षा, बटेश्वर धाम समेत 10 मंदिरों का बदलेगा स्वरूप; पर्यटन मंत्री ने की बड़ी घोषणा
ऑस्ट्रियाई इतिहासकार एबा कोच की पुस्तक में पुल निर्माण के दौरान ध्वस्त करने का ब्योरा दिया गया है। ककइया ईंटों से बने गेटवे के अवशेष पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पहली बार संरक्षण कार्य कराएगा। एएसआई की अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. स्मिता कुमार ने बताया कि गेटवे ऑफ रामबाग के पुल के नीचे अवशेषों को सहेजा जाएगा। करीब 60 लाख रुपये इस पर खर्च होंगे। वार्षिक संरक्षण योजना में इसे मंजूरी मिल चुकी है।
ये भी पढ़ें - Health News: खट्टी डकार और पेट में बन रहा एसिड तो हो जाएं सावधान, इन दो गंभीर बीमारियों के हैं ये संकेत
हाईवे और पुल के निर्माण में धरोहर हो गई नष्ट
11 दिसंबर 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यमुना नदी पर आरसीसी के पुल का लोकार्पण किया था। इसी पुल का शिलान्यास देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। पुल के निर्माण में रामबाग की ओर गेटवे बाधा बना तो इसके साथ जोहरा बाग की बाउंड्री भी ध्वस्त कर दी गई। जोहरा बाग के उत्तर पश्चिमी कोने के टावर और दीवार के इसी हिस्से के अवशेष बाकी है, जहां तबेला बना हुआ था। यहां भूसा भरा हुआ था। नेशनल हाईवे-2 के निर्माण के दौरान 1997-98 में इसका बाकी हिस्सा भी ढहा दिया गया।
ये भी पढ़ें - UP: कैंटर के नीचे फंसी कार, सड़क पर खून से सनी लाशें, मंजर देख कांप गई रूह; भयानक हादसे में दो युवकों की मौत
रामबाग से जोहरा बाग जाने का था यह रास्ता
अठारहवीं शताब्दी में बने जयपुर नक्शे के आधार पर रामबाग से जोहरा बाग जाने के लिए गेटवे ऑफ रामबाग प्रमुख रास्ता था। मुगल काल में वर्ष 1620 में जब जोहरा बाग मुमताज महल के पास आया और फिर जहांआरा को मिला, तब वह रामबाग से ज्यादा खूबसूरत और बेहतर था। वर्ष 1835 में अंग्रेज यात्री फैनी पार्क्स ने इस बाग को सैयद बाग का नाम दिया और कहा कि लाल बलुआ पत्थर से बना बाग रामबाग से सुंदर और अच्छी हालत में था।
ये भी पढ़ें - सीएम ग्रिड की खुदाई बनी आफत: कीचड़ और दलदल में फिसल रहे लोग, इन पांच मार्गों पर भूलकर भी न जाएं